कूडकेला/छाल /बुधराम अग्रवाल/विकास और कोयला खनन के नाम पर अपनी जमीनें कुर्बान करने वाले विस्थापित आज खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। छाल तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम ‘लात पुनर्वास’ में मूलभूत सुविधाओं का इस कदर अभाव है कि विस्थापित परिवारों का जीना दूभर हो गया है। एसईसीएल (SECL) प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन के उदासीन रवैये के खिलाफ अब ग्रामीणों में गहरा आक्रोश पनप रहा है।
कागजी साबित हुए वादे, जमीन पर सिर्फ अव्यवस्था
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि जब उनकी जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा था, तब एसईसीएल प्रबंधन ने बड़े-बड़े सुनहरे वादे किए थे। आश्वासन दिया गया था कि पुनर्वास स्थल पर एक आदर्श गांव की तरह तमाम आधुनिक और आवश्यक नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। लेकिन जमीन छिन जाने के सालों बाद भी आज तक वे वादे धरातल पर नहीं उतर सके।
शोभा की वस्तु बनी पानी की टंकी
पुनर्वास गांव में विकास के दावों की पोल खोलने के लिए यहाँ बनी पानी की टंकी ही काफी है। प्रशासन ने पानी की टंकी का निर्माण तो करा दिया है, लेकिन उसमें पानी भरने के लिए आज तक पंप की व्यवस्था नहीं की गई। नतीजतन, करोड़ों की लागत से बना यह ढांचा सिर्फ एक ‘शोभा की वस्तु’ बनकर रह गया है और ग्रामीण पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं।
न सड़क, न नाली; सुविधाओं के नाम पर केवल शून्य
गांव में बुनियादी ढांचे की स्थिति बेहद दयनीय है। लात पुनर्वास ग्राम में न तो गंदे पानी की निकासी के लिए पक्की नालियां हैं और न ही आवागमन के लिए सुदृढ़ पक्की सड़कें। इतना ही नहीं, बच्चों के शारीरिक विकास और मनोरंजन के लिए खेल का मैदान या पार्क जैसी अनिवार्य सुविधाओं का यहाँ नामोनिशान तक नहीं है। पूरी बस्ती आज भी एक बदहाल इलाके जैसी नजर आती है।
आर-पार की लड़ाई के मूड में ग्रामीण
विस्थापित परिवारों का कहना है कि मूलभूत सुविधाओं की इस कमी के कारण उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कदम-कदम पर भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने अब दोटूक शब्दों में एसईसीएल (SECL) प्रबंधन और जिला प्रशासन से मांग की है कि भूमि अधिग्रहण के समय किए गए सभी लिखित और मौखिक वादों को तत्काल पूरा किया जाए। यदि जल्द ही अधूरी सुविधाओं को बहाल नहीं किया गया, तो विस्थापित परिवार उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।