नई दिल्ली/ प्रीति बालानी/केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी’ (APAAR ID) को लेकर अदालत ने एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि स्कूली बच्चों की 12-अंकों वाली इस डिजिटल आईडी को बनाने के लिए अभिभावकों पर कोई दबाव नहीं बनाया जा सकता और इसके लिए उनकी स्पष्ट सहमति ली जानी अनिवार्य है।
यह फैसला देश के करोड़ों स्कूली छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए सीधी राहत लेकर आया है।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में दायर एक याचिका के माध्यम से यह चिंता जताई गई थी कि हालांकि नीतिगत स्तर पर APAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) को स्वैच्छिक बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई स्कूल इसे अनिवार्य बना रहे हैं।
मामले में मुख्य बिंदु उठाए गए थे:
- बच्चों के APAAR ID बनाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य किया जा रहा है।
- सहमति पत्र (Consent Form) में मना करने या अपनी सहमति वापस लेने (Opt-Out) का कोई स्पष्ट विकल्प नहीं दिया जाता।
- इससे बच्चों की निजता के अधिकार (Right to Privacy) और डिजिटल डेटा सुरक्षा नियमों का उल्लंघन होने का खतरा बना हुआ है।
क्या दिए गए निर्देश?
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट निर्देश जारी किए:
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- ‘Refusal/Opt-Out’ का विकल्प अनिवार्य: सीबीएसई और अन्य शिक्षण बोर्ड्स के सहमति पत्रों में अब स्पष्ट रूप से यह विकल्प देना होगा कि अभिभावक आईडी बनवाने से मना (Refuse) भी कर सकते हैं।
- सहमति वापस लेने का अधिकार: यदि कोई अभिभावक पहले सहमति दे चुका है, तो वह जब चाहे अपनी सहमति वापस ले सकता है।
- डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता: बच्चों का शैक्षणिक डेटा केवल संस्थागत और प्रशासनिक उपयोग तक ही सीमित रहेगा, इसका उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत की टिप्पणी:
“योजना के अपने प्रशासनिक लाभ हैं—जैसे एक स्कूल से दूसरे स्कूल में ट्रांसफर प्रक्रिया आसान होना। लेकिन इसके साथ ही निजता का अधिकार और अभिभावकों की स्वतंत्र सहमति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।”
अभिभावकों के लिए अब क्या बदला?
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- स्कूल नहीं बना सकते दबाव: यदि आप अपने बच्चे की APAAR ID नहीं बनवाना चाहते, तो स्कूल प्रशासन इसके लिए बाध्य नहीं कर सकता।
- पारदर्शी Consent Form: अब मिलने वाले फॉर्म में ‘हाँ’ के साथ-साथ ‘ना’ (मंजूर नहीं) का विकल्प चुनना संभव होगा।
- दाखिले पर असर नहीं: सहमति न देने की स्थिति में भी छात्र के स्कूल में दाखिले, परीक्षा देने या अन्य शैक्षणिक सुविधाओं पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।