गौरव कोचर
नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। पार्टी के कद्दावर नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के नेतृत्व में कुल 7 सांसदों ने आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्यसभा सभापति ने इन सांसदों के भाजपा में विलय (Merger) को संवैधानिक रूप से मंजूरी दे दी है, जिससे इन पर ‘दल-बदल विरोधी कानून’ (Anti-Defection Law) लागू नहीं होगा।
मुख्य आकर्षण: क्या हुआ और कैसे हुआ?
- बगावत का नेतृत्व: सूत्रों के अनुसार, राघव चड्ढा पिछले कुछ समय से पार्टी आलाकमान से नाराज चल रहे थे। उनके साथ पंजाब और दिल्ली से जुड़े 6 अन्य सांसदों ने भी पाला बदला है।
- संवैधानिक पेच: राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसद थे। 7 सांसदों का एक साथ जाना यानी दो-तिहाई (2/3) से ज्यादा का बहुमत है। इसी कानूनी प्रावधान के चलते इन सांसदों की सदस्यता रद्द नहीं होगी।
- सभापति की मुहर: राज्यसभा सचिवालय ने अधिसूचना जारी कर पुष्टि की है कि इन सांसदों को अब सदन में भाजपा सदस्यों के रूप में सीट आवंटित की जाएगी।
इन 7 सांसदों के नाम (संभावित सूची)
- राघव चड्ढा (पंजाब)
- संजीव अरोड़ा
- विक्रमजीत सिंह साहनी
- अशोक मित्तल
- (अन्य तीन स्थानीय और पंजाब के प्रतिनिधि)
राज्यसभा में बदलेगा शक्ति का संतुलन
इस विलय के बाद राज्यसभा में भाजपा की स्थिति और भी मजबूत हो गई है। अब सरकार को महत्वपूर्ण बिल पास कराने के लिए क्षेत्रीय दलों (जैसे BJD या YSRCP) पर निर्भर रहने की जरूरत कम पड़ेगी।
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दल |
पहले की स्थिति |
अब की स्थिति |
|---|---|---|
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AAP |
10 सीटें |
03 सीटें |
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BJP |
बहुमत के करीब |
+7 अतिरिक्त सीटें |
AAP और भाजपा की प्रतिक्रिया
आम आदमी पार्टी: “यह लोकतंत्र की हत्या है। भाजपा ने हमारी पार्टी को तोड़ने के लिए ईडी और सीबीआई का डर दिखाकर हमारे साथियों को डराया है। जनता इसका जवाब देगी।”
भारतीय जनता पार्टी: “यह मोदी जी की नीतियों की जीत है। ‘आप’ के सांसद अपनी ही पार्टी के भ्रष्टाचार और आंतरिक तानाशाही से तंग आ चुके थे। हम राष्ट्र निर्माण में उनका स्वागत करते हैं।”
राजनीतिक प्रभाव: क्या होगा आगे?
- पंजाब सरकार पर संकट? चूंकि ये सांसद पंजाब से जुड़े हैं, इसका सीधा असर मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार की स्थिरता और राज्य के कैडर के मनोबल पर पड़ सकता है।
- केजरीवाल की रणनीति: जेल से बाहर आने के बाद अरविंद केजरीवाल के लिए यह सबसे बड़ी संगठनात्मक चुनौती होगी कि वे बाकी बचे कुनबे को कैसे एकजुट रखते हैं।
- आगामी चुनाव: दिल्ली और अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में भाजपा इसे “भ्रष्टाचार के खिलाफ आप का आंतरिक विद्रोह” कहकर प्रचारित करेगी।