53 साल पुराना कानून: जिससे डरा हुआ है बाजार

गौरव कोचर 

​यह पूरा मामला साल 1973 के ऊर्जा संकट के बाद बने अमेरिकी कानूनों से जुड़ा है। उस समय ओपेक (OPEC) देशों द्वारा तेल प्रतिबंध लगाने के बाद अमेरिका ने ‘Energy Policy and Conservation Act of 1975’ लागू किया था।

  • कानून का प्रभाव: इस कानून ने दशकों तक अमेरिका से कच्चे तेल के निर्यात पर पाबंदी लगाए रखी थी। हालांकि 2015 में इसे शिथिल किया गया, लेकिन ट्रंप प्रशासन अब फिर से ऊर्जा क्षेत्र में ‘कड़े नियंत्रण’ और ‘आक्रामक विदेश नीति’ की ओर बढ़ रहा है।
  • ट्रंप की रणनीति: डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत वे वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित करने वाले बड़े फैसले ले सकते हैं। बाजार को डर है कि ट्रंप ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों पर इस स्तर के कड़े प्रतिबंध लगा सकते हैं जिससे बाजार से तेल गायब हो जाए।

​ कीमतों में ‘डरावनी’ तेजी के मुख्य कारण

​बाजार में इस समय तीन मुख्य वजहों से रिकॉर्ड तेजी की आशंका जताई जा रही है:

​1. होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर संकट

​ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच, यदि दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति लाइन (होर्मुज जलडमरूमध्य) बाधित होती है, तो कच्चे तेल के दाम $150 प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकते हैं।

​2. ईरान का ‘जीरो ऑयल’ निर्यात लक्ष्य

​ट्रंप प्रशासन का उद्देश्य ईरान के तेल व्यापार को पूरी तरह बंद करना है। यदि ईरान का तेल बाजार से बाहर होता है, तो मांग और आपूर्ति का संतुलन बुरी तरह बिगड़ जाएगा।

​3. डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक अस्थिरता

​मध्य पूर्व (Middle East) और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच ट्रंप की वापसी से अनिश्चितता बढ़ गई है। निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में तेल की जमाखोरी कर रहे हैं, जो कीमतों को और हवा दे रहा है।

 भारत पर पड़ने वाला प्रभाव

​भारत के लिए यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है क्योंकि:

  • आयात बिल में वृद्धि: भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है। कीमतों में $1 की बढ़ोतरी भी भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर अरबों का बोझ डालती है।
  • घरेलू महंगाई: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संभावित उछाल से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे फल, सब्जियां और आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ सकते हैं।
  • राजकोषीय घाटा: सरकार के लिए सब्सिडी और बजट का प्रबंधन करना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।

वैश्विक तेल बाजार इस समय एक अनिश्चित मोड़ पर खड़ा है। डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति और दशकों पुराने ऊर्जा कानूनों का नया स्वरूप यह तय करेगा कि दुनिया को आने वाले समय में ऊर्जा के लिए कितनी भारी कीमत चुकानी होगी। फिलहाल, बाजार विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह तेजी किसी भी पल एक ‘बड़े विस्फोट’ की तरह सामने आ सकती है।

संपादकीय टिप्पणी: यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय बाजार के रुझानों और ऐतिहासिक कानूनों के वर्तमान संदर्भ में विश्लेषण पर आधारित है। कीमतों में बदलाव की संभावना अत्यधिक संवेदनशील भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर निर्भर करती है।

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