हरिद्वार से गंगाजल लेकर अजमेर पहुंचे कांवड़िये, घूघरा में हुआ भव्य स्वागत
– सावन के पहले सोमवार पर भोलेनाथ का गंगाजल से जलाभिषेक
Edited By : नरेश गुनानी
टेलीग्राफ टाइम्स
जुलाई 14,2025
(हरिप्रसाद शर्मा)
अजमेर/घूघरा।
सावन के पावन महीने की शुरुआत के साथ ही भक्ति भाव की बयार बहने लगी है। इसी क्रम में हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर निकले श्रद्धालु सोमवार को अजमेर पहुंचे, जहां घूघरा गांव में ग्रामीणों ने उनका भव्य स्वागत किया। यह कांवड़ यात्रा अजमेर के नाका मदार क्षेत्र से आरंभ हुई थी और 1 जुलाई को हरिद्वार से रवाना होकर सोमवार को अपने गंतव्य तक पहुंची।
श्रद्धालु करीब 60 किलो गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हुए अजमेर पहुंचे। सावन के पहले सोमवार को भगवान भोलेनाथ का गंगाजल से जलाभिषेक किया गया। यात्रा की पावनता और कठिन तपस्या को देखते हुए गांववासियों ने श्रद्धालुओं के सम्मान में कोई कसर नहीं छोड़ी।
फूल-मालाओं और पुष्पवर्षा से हुआ अभिनंदन
जैसे ही कांवड़ यात्रा घूघरा गांव में पहुंची, स्थानीय ग्रामीणों ने श्रद्धालुओं का जोरदार स्वागत किया। श्रद्धालुओं पर फूलों की वर्षा की गई, मालाएं पहनाकर अभिनंदन किया गया। गांव के प्रमुख समाजसेवी सत्यनारायण भंसाली, संजय भट्ट, सरपंच देवकरण गुर्जर, प्रकाश सैन सहित कई गणमान्य लोगों ने स्वागत कार्यक्रम में भाग लिया और कांवड़ियों की सेवा में तत्परता दिखाई।
यात्रा में युवाओं की अहम भूमिका
कांवड़ यात्रा में कुनाल, यश, विशाल, योगेश, चीकू, गौतम, मोनिल और सूरज जैसे युवाओं की विशेष भूमिका रही। इन श्रद्धालुओं ने कठिन यात्रा को पूरी श्रद्धा, आस्था और समर्पण के साथ पूरा किया। रास्ते भर ‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के जयकारों से वातावरण गूंजता रहा, जिससे संपूर्ण मार्ग भक्तिमय हो उठा।
सेवा भाव और सामाजिक एकता का प्रतीक
यह यात्रा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि सामाजिक एकता और सद्भावना का भी प्रतीक बन गई है। ग्रामीणों ने श्रद्धालुओं के लिए जलपान और विश्राम की उत्तम व्यवस्था की, जिससे लम्बी यात्रा की थकान को कम किया जा सका।
गांववासियों ने कांवड़ियों को उनके आगामी पड़ाव के लिए शुभकामनाएं दीं और इस यात्रा को आत्मिक ऊर्जा से भरपूर बताया।
सावन में शिवभक्ति की उमंग
सावन का महीना शिवभक्ति का महीना माना जाता है। ऐसे में हरिद्वार से गंगाजल लाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करना विशेष पुण्य का कार्य माना जाता है। यह कांवड़ यात्रा न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमाण है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति और सेवा परंपरा का भी सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है।

