भुवनेश्वर/कटक/ आसिम अमिताव बिस्वाल/ओडिशा के सबसे संवेदनशील मामलों में से एक, विश्व हिंदू परिषद (VHP) के दिवंगत नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की 2008 में हुई जघन्य हत्या का मामला एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में गरमा गया है। ओडिशा उच्च न्यायालय (Odisha High Court) में एक नई अंतरिम याचिका दायर कर इस पूरे मामले की कोर्ट की निगरानी में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग तेज कर दी गई है।
यह नई याचिका उस समय आई है जब हाल ही में इस मामले से जुड़ी जांच रिपोर्ट के मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से गायब होने की चौंकाने वाली खबर सामने आई है।
क्या है पूरा मामला और क्यों उठी नई मांग?
23 अगस्त 2008 को जन्माष्टमी के पावन अवसर पर कंधमाल जिले के जलेसपेटा आश्रम में करीब 30-40 हथियारबंद हमलावरों ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की अंधाधुंध गोलियां बरसाकर बेरहमी से हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद पूरे ओडिशा में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़के थे, जिसमें करीब 38 लोगों की जान गई थी।
इस हत्याकांड के पीछे की बड़ी साजिश, धर्मांतरण (Religious Conversion) के एंगल और माओवादियों की भूमिका की जांच के लिए जस्टिस ए.एस. नायडू आयोग (Justice A.S. Naidu Commission) का गठन किया गया था। आयोग ने सितंबर 2016 में अपनी करीब 1500 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट तत्कालीन राज्य सरकार के गृह विभाग और मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) को सौंप दी थी।
’गायब फाइल’ ने बढ़ाया सियासी और कानूनी पारा
हाल ही में ओडिशा के गृह विभाग द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत के बाद यह सनसनीखेज खुलासा हुआ कि जस्टिस नायडू आयोग की वह महत्वपूर्ण रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के रिकॉर्ड से गायब है।
- जून 2024 में सरकार बदलने के बाद हुआ खुलासा: जब ओडिशा में जून 2024 में सत्ता परिवर्तन हुआ और फाइलें वापस गृह विभाग भेजी गईं, तो पाया गया कि यह संवेदनशील रिपोर्ट वहां मौजूद ही नहीं थी।
- FIR और SIT का गठन: मामले की गंभीरता को देखते हुए 20 जून 2026 को कैपिटल पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। सरकार ने इसकी जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का भी गठन किया है।
- बड़ी साजिश की आशंका: ओडिशा के राजस्व मंत्री सुरेश पुजारी सहित वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया है कि रिपोर्ट का इस तरह गायब होना महज प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि साक्ष्यों को मिटाने या सच को दबाने की एक सोची-समझी साजिश (Deliberate Theft) हो सकती है।
हाईकोर्ट में दायर याचिका में क्या है?
इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर याचिकाकर्ता ने ओडिशा हाईकोर्ट में लंबित पड़ी पूर्व याचिका के साथ यह नई अंतरिम याचिका जोड़ी है। याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गई हैं:
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- सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका: याचिका में कहा गया है कि राज्य के सर्वोच्च कार्यकारी कार्यालय (CMO) से एक न्यायिक आयोग की रिपोर्ट का गायब होना बेहद गंभीर है। यह मामले से जुड़े अहम तथ्यों को छिपाने और सबूतों से छेड़छाड़ की ओर इशारा करता है।
- कोर्ट की निगरानी में CBI जांच: याचिकाकर्ता का तर्क है कि स्थानीय पुलिस या राज्य की एजेंसियां इस रसूखदार और संवेदनशील मामले के पीछे छिपे बड़े चेहरों को बेनकाब नहीं कर पाएंगी। इसलिए हाईकोर्ट इस पूरे घटनाक्रम को संज्ञान में लेते हुए तत्काल ‘कोर्ट-मॉनिटर्ड’ CBI जांच के आदेश दे।
राजनीतिक घमासान तेज: इस खुलासे के बाद ओडिशा की राजनीति में भी भूचाल आ गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आरोप लगाया है कि पूर्ववर्ती बीजद (BJD) सरकार के समय जानबूझकर इस रिपोर्ट को छिपाया या नष्ट किया गया ताकि कंधमाल साजिश का सच बाहर न आ सके। वहीं विपक्ष इसे मौजूदा सरकार का ध्यान भटकाने का हथकंडा बता रहा है।
साधु-संतों और हिंदू संगठनों का कहना है कि घटना के 16 साल से अधिक बीत जाने के बाद भी इस हत्याकांड की मुख्य साजिश रचने वाले ‘मास्टरमाइंड’ और इसके पीछे के असली नेटवर्क का पर्दाफाश नहीं हो सका है। अब सभी की निगाहें ओडिशा हाईकोर्ट पर टिकी हैं कि वह इस नई याचिका और गायब हुई रिपोर्ट के मामले पर क्या रुख अपनाता है।