“स्वर्णिम भारत” किताब पर रोक हास्यास्पद: पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा सरकार को घेरा

“स्वर्णिम भारत” किताब पर रोक हास्यास्पद: पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा सरकार को घेरा
– एक राजनीतिक निर्णय या ऐतिहासिक सच्चाई से परहेज?

रिपोर्ट: महेश गुप्ता 
Edited By : गौरव कोचर 
टेलीग्राफ टाइम्स
जुलाई 11,2025

जयपुर, 11 जुलाई – राजस्थान में “आजादी के बाद का स्वर्णिम भारत” किताब को स्कूलों में पढ़ाने पर रोक लगाने के सरकार के निर्णय पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस फैसले को “हास्यास्पद” बताते हुए भाजपा सरकार पर इतिहास से छेड़छाड़ का गंभीर आरोप लगाया है।

गहलोत ने कहा, “यह ऐतिहासिक तथ्य है कि आजादी के बाद सबसे ज्यादा समय तक कांग्रेस की सरकारें रहीं और उन्हीं सरकारों के कार्यकाल में देश ने अंतरिक्ष, औद्योगिकीकरण, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में ऊंचाइयों को छुआ।” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस कार्यकाल में वैज्ञानिकों ने चंद्रयान बनाया, इंजीनियरों ने बांध और बड़े कारखाने खड़े किए, और शिक्षण संस्थान स्थापित हुए।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेताओं—इंदिरा गांधी और राजीव गांधी—ने देश के लिए बलिदान दिया, और ऐसे ऐतिहासिक योगदानों को नकारना या छुपाना न केवल अनुचित बल्कि लोकतंत्र के प्रति अनादर है।

किताबों की बर्बादी पर सवाल

गहलोत ने सरकार के उस फैसले की भी आलोचना की जिसमें करीब 2.50 करोड़ रुपये की छपी हुई किताबों को रद्दी बना दिया गया है। उन्होंने व्यय को जनता के पैसे की बर्बादी करार देते हुए सुझाव दिया कि “यदि सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियां जोड़ना चाहती है तो वह अतिरिक्त पृष्ठ छपवाकर किताबों के साथ जोड़ सकती है।

भाजपा सरकार पर आरोप

गहलोत ने भाजपा सरकार पर राजनीतिक पूर्वाग्रह के तहत इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सच्चाई को छिपाने की कोशिश से नई पीढ़ी भ्रमित होगी और यह शिक्षा के राजनीतिकरण का एक खतरनाक उदाहरण है।

शिक्षा क्षेत्र में विचारधारा का टकराव

यह बयान उस समय आया है जब राजस्थान में भाजपा सरकार द्वारा पाठ्यक्रम में बदलाव और कई किताबों को हटाए जाने को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। सरकार का पक्ष है कि “स्वर्णिम भारत” जैसी किताबें एकतरफा दृष्टिकोण पर आधारित हैं, जबकि विपक्ष इसे इतिहास से छेड़छाड़ और राजनीतिक प्रतिशोध बता रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के इस बयान ने शिक्षा और इतिहास के राजनीतिकरण पर बहस को और तीव्र कर दिया है। सवाल अब यही है—क्या सरकार शिक्षा में निष्पक्षता बनाए रख पा रही है, या इतिहास विचारधारा की भेंट चढ़ता जा रहा है?

 

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