स्वच्छ भारत को मुंह चिढ़ाता छाल का अधूरा शौचालय, लाखों फूंकने के बाद भी खुले में शौच को मजबूर ग्रामीण

गणपत चौहान

छाल (रायगढ़): एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पदचिन्हों पर चलते हुए पूरे देश को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहे हैं। लाल किले की प्राचीर से लेकर देश के सुदूर गांवों तक ‘ओडीएफ’ (खुले में शौच मुक्त) भारत का डंका पीटा जा रहा है। जनता को एक सम्मानजनक और स्वास्थ्यप्रद जीवन देने के लिए सरकारी खजाने से करोड़ों-अरबों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इस दावों से कोसों दूर है। इस महाअभियान को पलीता लगाने और भ्रष्टाचार का एक बेहद शर्मनाक मामला रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत छाल से सामने आया है।

लाखों की लागत, नतीजा सिफर: सरकारी राशि की बंदरबांट

​धरमजयगढ़ के ग्राम पंचायत छाल में सरकारी पैसों की ऐसी बंदरबांट हुई है कि सालों पहले स्वीकृत हुआ सार्वजनिक शौचालय आज तक अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई से लाखों रुपए की लागत से बनने वाला यह शौचालय आज भी अधूरा खड़ा है। यह अधूरा ढांचा सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘स्वच्छ भारत मिशन’ का मखौल उड़ा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि शौचालय निर्माण के नाम पर भारी लापरवाही बरती गई है और अधिकारियों व ठेकेदारों की मिलीभगत से भ्रष्टाचार का खुला खेल खेला गया है।

कागजों में चमचमाता शौचालय, जमीन पर सिर्फ खंडहर

​सालों बीत जाने के बाद भी इस शौचालय को चार दीवारें और एक मुकम्मल छत तक नसीब नहीं हो सकी है। विडंबना देखिए कि जिस काम को महज कुछ महीनों में पूरा हो जाना चाहिए था, वह सालों से फाइलों के बीच दबा पड़ा है। कागजों में जिस शौचालय को चमचमाता हुआ दिखाकर राशि की हेराफेरी कर ली गई, वह जमीन पर आज सिर्फ एक खंडहरनुमा ढांचा बनकर रह गया है।

​इस प्रशासनिक उदासीनता का खामियाजा छाल ग्राम पंचायत की जनता को भुगतना पड़ रहा है। गाँव के लोग आज भी सुबह-शाम हाथ में लोटा थामकर खुले में जाने को मजबूर हैं। इस स्थिति में सबसे ज्यादा फजीहत और असुरक्षा का सामना गाँव की महिलाओं, युवतियों और बुजुर्गों को करना पड़ रहा है, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

जिम्मेदार मौन, प्रशासन ने मूंदी आंखें

​इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात प्रशासनिक अधिकारियों का ढुलमुल रवैया है। ग्राम पंचायत से लेकर जनपद के आला अधिकारियों को इस अधूरे निर्माण और जनता की परेशानी की पूरी भनक है, लेकिन इसके बावजूद सब ‘गांधारी’ बनकर आंखें मूंदे बैठे हैं। किसी भी जिम्मेदार अधिकारी के पास इस बात का जवाब नहीं है कि शौचालय के लिए आई लाखों की राशि आखिर कहाँ हजम हो गई।

बड़ा सवाल: कब टूटेगी प्रशासन की कुंभकर्णी नींद?

​छाल ग्राम पंचायत में अधूरा पड़ा यह ढांचा सिर्फ ईंट-सीमेंट की दीवार नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक सड़न की गवाही है जो शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं को दीमक की तरह चाट रही है। अब देखना यह होगा कि इस सच के सामने आने के बाद रायगढ़ जिला प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूटती है और दोषियों पर कोई कड़ी कार्रवाई होती है, या फिर स्वच्छ भारत का यह अधूरा सच ऐसे ही छाल पंचायत की साख पर बट्टा लगाता रहेगा।

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