सुख-समृद्धि का महायोग है अक्षय तृतीया: बाबा-भागलपुर

लोकेंद्र सिंह शेखावत 

भागलपुर, बिहार। सनातन धर्म में वर्ष के 365 दिन पूजा-पाठ और दान के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं, किंतु इनमें अक्षय तृतीया की तिथि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक और महान भविष्यवेत्ता दैवज्ञ पं. आर. के. चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर ने इस तिथि के महत्व पर प्रकाश डाला है।

अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक महत्व

​बाबा-भागलपुर ने बताया कि ‘अक्षय’ का शाब्दिक अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो। जो स्थायी है, वही सत्य है और सत्य केवल परमात्मा है, जो अक्षय, अखण्ड और सर्वव्यापक है। अक्षय तृतीया को ‘ईश्वर तिथि’ माना जाता है।

  • परशुराम तिथि: यह भगवान श्रीपरशुराम जी का जन्म दिवस होने के कारण परशुराम तिथि भी कहलाती है।
  • युगादि तिथि: चारों युगों में से त्रेता युग का आरम्भ इसी पावन तिथि से हुआ था।

तिथि और मुहूर्त (वर्ष 2026)

​अक्षय तृतीया का पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। वर्ष 2026 की गणना के अनुसार:

  • तारीख: मिथिला पंचांग और उदया तिथि के अनुसार 20 अप्रैल 2026 (सोमवार) को यह पर्व मनाना शास्त्रसम्मत है।
  • समय: तृतीया तिथि 19 अप्रैल को सुबह 10:48 बजे से शुरू होकर 20 अप्रैल को सुबह 07:27 बजे तक रहेगी। चूंकि सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि (उदया तिथि) को मान्यता दी जाती है, इसलिए 20 अप्रैल का दिन श्रेष्ठ है।

अबूझ मुहूर्त का गौरव

​पंचांग में अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है। इस दिन बिना किसी ज्योतिषीय विचार या मुहूर्त निकलवाए सभी शुभ कार्य जैसे विवाह, संपत्ति की खरीदारी और गृह प्रवेश किए जा सकते हैं।

पौराणिक मान्यताएं और परम्पराएं

​शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन किया गया गंगा स्नान, दान, जाप और पूजा अक्षय फल प्रदान करती है।

  • अक्षय वट और पात्र: प्रयागराज का अक्षय वट मनोकामना पूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, वहीं महाभारत काल में द्रौपदी का अक्षय पात्र कभी रिक्त नहीं होता था।
  • नरसिंह भगवान का चमत्कार: आंध्र प्रदेश के सीमाचलन में नरसिंह भगवान के मंदिर में विग्रह पर साल भर चंदन का लेप रहता है। अक्षय तृतीया के दिन प्रतिमा में स्वतः अग्नि प्रज्वलित होती है, जिसके दर्शन के लिए लाखों भक्त उमड़ते हैं।
  • क्षेत्रीय परम्परा: मिथिलांचल में इस दिन शरबत पिलाने और मिट्टी का घड़ा दान करने की विशेष परम्परा है।

​बाबा-भागलपुर ने समस्त सनातन धर्मावलंबियों से आह्वान किया है कि वे इस पुनीत अवसर का उपयोग अपने परिवार और समाज के कल्याण के लिए अवश्य करें।

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