सिस्टम की प्यास बुझी, जनता बूंद-बूंद को मोहताज: रायगढ़ के पुसलदा में रद्दी के ढेर में मिले समाधान के बड़े-बड़े दावे

गनपत चौहान 

  • धरमजयगढ़ जनपद के पुसलदा गांव की 1500 की आबादी भीषण गर्मी में नदी और कुओं के मटमैले पानी पर निर्भर
  • सरकारी संवेदनशीलता की खुली पोल: जनसमस्या निवारण शिविर में दिए आवेदन दफ्तरों के कचरे में मिले
  • 20 मार्च को मिली थी पेयजल संकट से निजात की उम्मीद, दो महीने बाद भी धरातल पर शून्य काम
  • महंत मोहल्ला और नीम पारा में पानी के लिए हाहाकार, बिजली गुल होते ही बदतर हो जाते हैं हालात

कुड़ेकेला/रायगढ़। छत्तीसगढ़ सरकार एक ओर जहां समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ पहुँचाने का दम भरती है, वहीं दूसरी ओर मैदानी स्तर पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। विकास के दावों के बीच प्रशासनिक उदासीनता का एक बेहद शर्मनाक मामला धरमजयगढ़ जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले ग्राम पुसलदा से सामने आया है। यहाँ की करीब 1500 की आबादी इस तपती और भीषण गर्मी में अपने गले को तर करने के लिए नदी और कुओं के दूषित व मटमैले पानी पर निर्भर है। विडंबना देखिए कि जिस गंभीर समस्या के समाधान के लिए ग्रामीणों ने कतारों में लगकर जनसमस्या निवारण शिविर में गुहार लगाई थी, वे आवेदन आज सरकारी दफ्तरों के कचरे और रद्दी के ढेर की शोभा बढ़ा रहे हैं।

​20 मार्च को मिली थी उम्मीद, दो महीने बाद मिला सिर्फ धोखा

​पेयजल की किल्लत से जूझ रहे पुसलदा के ग्रामीणों को बीती 20 मार्च को एक उम्मीद की किरण दिखाई दी थी। छाल में आयोजित जिला स्तरीय जनसमस्या निवारण शिविर में ग्रामीणों ने बड़े उत्साह और विश्वास के साथ अपनी प्यास बुझाने के लिए प्रशासन को आवेदन सौंपा था। लेकिन दो महीने का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी शासन-प्रशासन की कुंभकर्णी नींद नहीं खुली है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि अफसरों ने उनकी जनहित की समस्या को रद्दी समझकर फेंक दिया, क्योंकि आज तक धरातल पर अतिरिक्त रूप से पानी की एक बूंद की व्यवस्था भी प्रशासनिक स्तर पर नहीं की गई है।

​पारंपरिक जल स्रोत ही अब ग्रामीणों का एकमात्र सहारा

​गांव में जल संकट की स्थिति इतनी विकट और डरावनी हो चुकी है कि लोग अपनी प्यास बुझाने के लिए वापस आदिम और पारंपरिक जल स्रोतों पर लौटने को मजबूर हैं।

  • केसव राठिया (उपसरपंच) का कहना है: “गर्मी बढ़ते ही स्थिति बदतर हो जाती है। गांव में पानी की भारी किल्लत है। मजबूरी में नदी से पंप के जरिए अस्थाई पाइप लाइन डालकर पानी लाया जा रहा है, जो इतनी बड़ी आबादी के लिए बिल्कुल नाकाफी है।”
  • मेघा महंत (पंच, वार्ड क्र. 6) ने बताया: “गांव के महंत मोहल्ला और नीम पारा में पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। रही-सही कसर बिजली की अघोषित कटौती पूरी कर देती है। तपती धूप में जैसे ही बिजली गुल होती है, पानी के लिए हाहाकार मच जाता है। ऐसे समय में कुआं ही प्यास बुझाने का एकमात्र सहारा बचता है।”

​सरपंच का छलका दर्द: वातानुकूलित कमरों में बैठे अफसरों को सरोकार नहीं

​ग्राम पंचायत सरपंच ने कड़े शब्दों में जिला प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सरपंच का कहना है कि इतने बड़े जिला स्तरीय शिविर में लिखित निवेदन करने के बावजूद आज तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी गांव की जमीनी स्थिति देखने या पानी की किल्लत का जायजा लेने पुसलदा नहीं पहुँचा। 1500 लोग इस तपती और झुलसा देने वाली गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए कैसे संघर्ष कर रहे हैं, इससे शायद वातानुकूलित कमरों में बैठे बड़े अफसरों को कोई सरोकार नहीं है।

​कहाँ गई सरकार की संवेदनशीलता?

​जब सूबे की सरकार खुद को गरीबों के प्रति संवेदनशील और जवाबदेह बताती है, तो पुसलदा जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों के गांवों में लोग आज भी नदी का असुरक्षित पानी पीने को मजबूर क्यों हैं? यह स्थिति साफ तौर पर सवाल खड़ी करती है कि क्या सरकार के ये जनसमस्या निवारण शिविर केवल कागजी खानापूर्ति, आंकड़ों की बाजीगरी और फोटो खिंचवाने का जरिया बनकर रह गए हैं?

​फिलहाल, रद्दी के ढेर में मिले आवेदनों ने इस पूरी व्यवस्था को बेनकाब कर दिया है। अब देखना यह होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद सोया हुआ प्रशासनिक अमला जागता है और पुसलदा की जनता को राहत मिलती है, या फिर यहाँ के बेबस ग्रामीण इस पूरी गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए यूं ही तरसते रहेंगे।

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