सियासत की भेंट चढ़ा गोवंश; कागजों में ‘गौधाम’, सड़कों पर ‘बेसहारा’

विशेष रिपोर्ट: गनपत चौहान 

रायगढ़। छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के साथ ही दावों और वादों की दिशा तो बदली, लेकिन बेजुबान गौवंश की तकदीर और बदतर होती चली गई। कभी ‘गौठान’ के नाम पर प्रदेश की राजनीति गरमाई थी, तो अब ‘गौधाम’ और ‘जंगल कॉरिडोर’ के नए सपनों ने गौवंश को तपती सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया है।

​आसमान से आग, जमीन पर बेबसी

​वर्तमान में पारा 45 डिग्री के पार पहुंच चुका है। चिलचिलाती धूप और लू के थपेड़ों के बीच रायगढ़ जिले की सड़कों पर भटकते सैकड़ों गौवंश इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि सरकारें बदलने से इन बेजुबानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। डामर की जलती सड़कों पर न तो इनके लिए पीने के पानी की व्यवस्था है और न ही पेट भरने के लिए चारा।

​गौठान बनाम कॉरिडोर: फाइलों में फंसी व्यवस्था

​पिछली सरकार (2018-23) के दौरान जिले की 549 ग्राम पंचायतों में 500 से अधिक गौठानों का निर्माण किया गया था। गोबर खरीदी और वर्मी कंपोस्ट निर्माण से महिला स्व-सहायता समूहों को रोजगार मिला हुआ था। लेकिन सत्ता परिवर्तन के ढाई साल बाद स्थिति पूरी तरह पलट चुकी है।

  • ठंडे बस्ते में गौठान: वर्तमान सरकार ने पुरानी योजना को भ्रष्टाचार का केंद्र बताकर लगभग बंद कर दिया है।
  • लापता कॉरिडोर: भाजपा सरकार ने गौवंश के लिए ‘जंगल कॉरिडोर’ बनाने का वादा किया था, जहाँ प्राकृतिक परिवेश में उनके रहने और चारे की व्यवस्था होनी थी। विडंबना यह है कि यह योजना आज भी प्रशासनिक फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई है।

​आंकड़ों का मायाजाल: 549 पंचायतें और महज एक ‘गौधाम’

​भौगोलिक रूप से विशाल रायगढ़ जिला, जिसमें 10 तहसीलें और 951 राजस्व ग्राम शामिल हैं, वहां वर्तमान की ‘गौधाम’ योजना ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

विभागीय दावों की पोल: जिले में वर्तमान में महज एक गौधाम कागजों पर सक्रिय बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन ने पुराने गौठानों पर ही ‘गौधाम’ का बोर्ड लगाकर इतिश्री कर ली है। शेष 500 से अधिक पंचायतों में बने गौठान अब खंडहरों में तब्दील हो रहे हैं।

 

​ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रहार

​गौठानों के बंद होने का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। ‘नरवा, गरुआ, घुरवा, बारी’ के जरिए आत्मनिर्भरता का सपना देख रही हजारों महिलाओं के हाथ से रोजगार छिन गया है। न तो अब गोबर की खरीदी हो रही है और न ही जैविक खाद की बिक्री, जिससे महिला समूहों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।

​सुलगते सवाल: कौन है जिम्मेदार?

​गौ-सेवा के नाम पर वोट बटोरने वाली राजनीति आज इन बेजुबानों की आह सुनने को तैयार नहीं है। क्या ‘गौधाम’ और ‘कॉरिडोर’ जैसे भारी-भरकम शब्द सिर्फ चुनावी जुमले थे? रायगढ़ की सड़कों पर बेबस घूमती गाएं और रोजगार खो चुकी महिलाएं आज शासन-प्रशासन से जवाब मांग रही हैं।

​यदि सरकार वाकई गौ-संरक्षण के प्रति गंभीर है, तो उसे कागजी दावों से निकलकर धरातल पर पानी और चारे के पुख्ता इंतजाम करने होंगे, वरना ये बेजुबान यूं ही सियासत की भेंट चढ़ते रहेंगे।

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