रिपोर्ट: योगेश शर्मा, जयपुर
जयपुर। कश्मीर की वादियों में सेना के अदम्य साहस और वहां की जमीनी हकीकत को बयां करती मेजर जनरल रंजन महाजन (सेवानिवृत्त) की पुस्तक ‘कश्मीर इन द लाइन ऑफ फायर’ पर रविवार को जयपुर के अशोक क्लब में एक गरिमामय चर्चा का आयोजन किया गया। इस सत्र में लेखक मेजर जनरल महाजन ने जयपुर के प्रसिद्ध लेखक और पब्लिसिस्ट जगदीप सिंह के साथ संवाद करते हुए कश्मीर में अपने 15 वर्षों के लंबे अनुभव और सेना की चुनौतीपूर्ण भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
साधारण लोगों के असाधारण साहस की कहानी
चर्चा के दौरान मेजर जनरल रंजन महाजन ने कहा कि यह पुस्तक केवल सैन्य अभियानों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह उन साधारण लोगों की कहानी है जिन्होंने असाधारण परिस्थितियों का सामना अटूट साहस के साथ किया। उन्होंने बताया कि कश्मीर में अपने पांच कार्यकालों के दौरान उन्होंने संघर्ष, नेतृत्व और मानवीय दृढ़ता को बहुत करीब से देखा है।
डीजीपी राजस्थान और सैन्य अधिकारियों ने किया विमोचन
इस महत्वपूर्ण पुस्तक का औपचारिक विमोचन राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव शर्मा, साउथ वेस्टर्न कमान के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल पदम सिंह शेखावत और अजय सिंघा द्वारा किया गया।
डिजिटल नवाचार: QR कोड के जरिए जीवंत अनुभव
पुस्तक की एक अनूठी विशेषता इसमें इस्तेमाल किए गए QR कोड्स हैं। लेखक ने बताया कि इस तकनीक की मदद से पाठक हेलीकॉप्टर ऑपरेशन्स और अन्य सैन्य विजुअल्स को रियल-टाइम में देख सकते हैं। इस नई पहल का उद्देश्य आम नागरिकों को सेना के कामकाज और वहां के चुनौतीपूर्ण माहौल की गहराई से समझ प्रदान करना है।
राष्ट्रीय राइफल्स और आतंकवाद-रोधी अभियान
मेजर जनरल महाजन ने राष्ट्रीय राइफल्स (RR) की भूमिका पर जोर देते हुए बताया कि यह बल विशेष रूप से कश्मीर जैसे क्षेत्रों में आतंकवाद-रोधी अभियानों के लिए तैयार किया गया है। उन्होंने समझाया कि सुरक्षित ठिकानों से बाहर सेना का हर मूवमेंट जोखिम भरा होता है और सैनिकों को हर पल सतर्क रहना पड़ता है।
कश्मीरी पंडितों का पलायन और मानवीय संवेदनाएं
चर्चा के दौरान कश्मीरी पंडितों के दर्दनाक पलायन का भी जिक्र हुआ। लेखक ने इसे अपने कार्यकाल की सबसे भावुक और कठिन घटनाओं में से एक बताया। उन्होंने विस्थापित समुदायों पर संघर्ष के दीर्घकालिक प्रभावों पर संवेदनशीलता के साथ अपनी बात रखी।
अनसुने किस्से और सैनिकों की प्रेरणा
सत्र में मेजर जनरल ने कई अनसुने किस्से साझा किए, जिसमें सीमा पार करने वाले एक सैनिक के मनोवैज्ञानिक संघर्ष और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले उन जांबाज सैनिकों की कहानियां शामिल थीं, जो कठिन परिस्थितियों में असली नायक बनकर उभरे।
सत्र का समापन
कार्यक्रम की शुरुआत अजय सिंघा के स्वागत संबोधन से हुई। सत्र के अंत में एक संवाद सत्र (Q&A) आयोजित किया गया, जिसमें श्रोताओं ने सैन्य रणनीति और कश्मीर की वर्तमान स्थिति पर लेखक से सवाल पूछे। कार्यक्रम का समापन तुषारिका सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।