सांसद निधि या संगठन निधि? रायगढ़ में 3 लाख की जनसंपर्क राशि पर उठे गंभीर सवाल

भाजपा नेताओं, पदाधिकारियों और उनके परिजनों के नाम स्वीकृत हुई जनसंपर्क राशि; विकास के बजाय राजनीतिक नेटवर्क को पोषित करने के आरोप

गनपत चौहान 

रायगढ़। सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास और जनसंपर्क मद का वास्तविक उद्देश्य जनता और समाज के बीच संवाद, जागरूकता तथा सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है। इस निधि का प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि क्षेत्र के जरूरतमंदों, सामाजिक संगठनों और जनहित के कार्यों को त्वरित रूप से वित्तीय सहायता मिल सके। लेकिन रायगढ़ जिले में इसी जनसंपर्क राशि के वितरण को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि लगभग 3 लाख रुपये की जनसंपर्क राशि का एक बड़ा हिस्सा आम जनता या वास्तविक जरूरतमंदों के बजाय सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े नेताओं, पदाधिकारियों, उनके परिजनों तथा समर्थकों के नाम पर स्वीकृत कर दिया गया है।

​चहेतों और अपनों पर मेहरबानी?

​सूत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों से मिली जानकारी के अनुसार, रायगढ़ लोकसभा सांसद राधेश्याम राठिया द्वारा करीब 48 लोगों को कुल 2.98 लाख रुपये की राशि विभिन्न मदों के तहत वितरित की गई है। इस पूरी सूची का यदि सूक्ष्मता से विश्लेषण किया जाए, तो इसमें भाजपा के मंडल अध्यक्षों, स्थानीय पदाधिकारियों, उनके सगे-संबंधियों, विभिन्न रामायण व कीर्तन मंडलियों के साथ-साथ शिक्षा और उपचार के नाम पर राशि पाने वाले लाभार्थियों के नाम दर्ज हैं।

​अब क्षेत्र में यह सवाल पूरी शिद्दत के साथ तैर रहा है कि क्या यह राशि वास्तव में सामाजिक कल्याण और जमीनी हित में खर्च हुई है, या फिर यह सार्वजनिक धन के जरिए राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने का एक जरिया मात्र बनकर रह गई है?

​निष्पक्षता और पात्रता पर उठे प्रश्नचिह्न

​स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि सांसद जनसंपर्क निधि का मूल उद्देश्य आम जनता और निस्वार्थ भाव से काम करने वाले सामाजिक संगठनों को संबल प्रदान करना है। इस निधि को किसी एक विशेष राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं, उनके परिजनों या करीबियों तक ही सीमित कर देना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। यदि लाभार्थियों की अंतिम सूची में केवल एक ही राजनीतिक विचारधारा से जुड़े चेहरों और उनके रिश्तेदारों का दबदबा दिखाई देता है, तो वितरण प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

​मामला इसलिए भी गंभीर और संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि रायगढ़ जिले में आज भी अनेक ऐसी पंजीकृत सामाजिक संस्थाएं, सांस्कृतिक संगठन, उभरती हुई खेल प्रतिभाएं और अत्यंत जरूरतमंद परिवार मौजूद हैं, जो लंबे समय से शासकीय सहायता या सहयोग की आस लगाए बैठे हैं। उन्हें दरकिनार कर केवल राजनीतिक रूप से सक्रिय और रसूखदार व्यक्तियों को इस सूची में प्राथमिकता देना इस धारणा को मजबूत करता है कि जनसंपर्क निधि का उपयोग ‘जनहित’ से ज्यादा ‘संगठन हित’ को साधने के लिए किया गया है।

चयन की प्रक्रिया पर बड़े सवाल:

सूत्रों का दावा है कि सूची में शामिल कई नाम सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के सक्रिय विंग्स से जुड़े हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि:

  • ​इन लाभार्थियों के चयन का वास्तविक मापदंड क्या था?
  • ​क्या इस राशि के आवंटन के लिए कोई सार्वजनिक आवेदन प्रक्रिया अपनाई गई थी?
  • ​क्या आवेदकों की पात्रता, आर्थिक स्थिति और जरूरत का कोई प्रशासनिक आकलन हुआ था?
  • ​या फिर केवल राजनीतिक निकटता और सिफारिश ही चयन का एकमात्र आधार बनी?

 

​राजनीतिक हलचल और पारदर्शिता की मांग

​इस पूरे मामले के सामने आने के बाद रायगढ़ के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल मच गई है। विपक्ष ने इसे सीधे तौर पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और राजनीतिक तुष्टीकरण का मामला बताते हुए मोर्चा खोल दिया है। वहीं दूसरी ओर, आम नागरिक भी अब इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग उठा रहे हैं।

​इस समय क्षेत्र की जनता की निगाहें सांसद कार्यालय की ओर टिकी हैं। देखना होगा कि इस गंभीर विषय पर सांसद कार्यालय की ओर से क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण आता है और क्या इस वित्तीय आवंटन की चयन प्रक्रिया को पारदर्शी साबित करने के लिए लाभार्थियों की पूरी प्रोफाइल और उनके आवेदनों के विवरण को सार्वजनिक किया जाएगा या नहीं।

​मुख्य बिंदु: जिनके जवाब जनता चाहती है

  • पात्रता का आधार: जनसंपर्क राशि के वितरण के लिए निर्धारित शासकीय नियम और मापदंड क्या थे?
  • वास्तविक जरूरतमंद उपेक्षित: सूची में शामिल लोगों में से कितने वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर या जरूरतमंद श्रेणी में आते हैं?
  • राजनीतिक संबद्धता: क्या लाभार्थी बनने के लिए किसी विशेष दल का कार्यकर्ता या पदाधिकारी होना अनिवार्य योग्यता बन गया?
  • जवाबदेही: क्या सांसद कार्यालय इस सूची की स्क्रूटनी रिपोर्ट और चयन के ठोस कारणों को सार्वजनिक मंच पर रखेगा?

​रायगढ़ में उठे ये सवाल अब केवल 3 लाख रुपये के बजटीय आवंटन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सार्वजनिक धन के वितरण में अपनाई जाने वाली पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक नैतिकता का एक बड़ा लिटमस टेस्ट बन चुके हैं।

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