नई दिल्ली / सरिस्का / नरेश गुनानी/वन्यजीव संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करने की दिशा में भारत के प्रयासों को एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यशाला में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने देश में बाघों और अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
कार्यशाला के दौरान इस बात को रेखांकित किया गया कि सरिस्का टाइगर रिजर्व, जहाँ कभी बाघ स्थानीय रूप से विलुप्त हो गए थे, अब वैज्ञानिक संरक्षण प्रयासों के कारण अन्य क्षेत्रों के लिए एक ‘स्रोत आबादी’ (Source Population) बनने की क्षमता रखता है।
स्थानीय समुदायों का कल्याण और पारिस्थितिक संबद्धता (Landscape Connectivity)
मंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के हितों और कल्याण की रक्षा करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा:
”हमारी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि हमारे बाघों की रक्षा हो, हमारे वन हरे-भरे और स्वस्थ रहें और स्थानीय समुदाय समृद्ध होते रहें।”
इसके अलावा, जिन भौगोलिक क्षेत्रों में बाघों और हाथियों का वितरण क्षेत्र आपस में मिलता है, वहाँ कॉरिडोर (भू-भाग की परस्पर संबद्धता) को मजबूत करने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। सरकार का उद्देश्य केवल बाघों की रक्षा करना ही नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई भी वन्यजीव प्रजाति विलुप्त न हो।
तीन महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन
इस अवसर पर वन्यजीव प्रबंधन से जुड़े तीन बेहद महत्वपूर्ण नीतिगत दस्तावेज़ जारी किए गए:
- भारत में बाघों के सक्रिय प्रबंधन पर रोड मैप: यह दस्तावेज़ बाघों की कमी वाले क्षेत्रों की पहचान करने और पारिस्थितिक स्थितियों के आधार पर प्रबंधन कार्यों को निर्धारित करने के लिए एक विस्तृत रूपरेखा प्रदान करता है।
- भारत में बाघों के संरक्षण और पुनर्वास पर पुस्तिका: इसमें सरिस्का और पन्ना टाइगर रिजर्व के सफल अनुभवों और सीखों का दस्तावेजीकरण किया गया है, जो भविष्य के पूरक कार्यक्रमों के लिए मार्गदर्शिका का काम करेगी।
- प्रोजेक्ट चीता की वार्षिक रिपोर्ट (सितंबर 2024 – दिसंबर 2025): इस रिपोर्ट में भारत के चीता पुनर्वास कार्यक्रम की प्रगति, पर्यावास प्रबंधन, पशु चिकित्सा उपायों और सामुदायिक भागीदारी का पूरा लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है।
कार्यशाला के मुख्य तकनीकी सत्र और भविष्य की रणनीति
इस कार्यशाला में देश भर के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और कई तकनीकी सत्रों के माध्यम से भविष्य का खाका तैयार किया गया। मुख्य चर्चाएं निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित रहीं:
- शिकार आधार संवर्धन (Prey Augmentation): पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करने के लिए गौर और बारहसिंगा जैसी प्रजातियों के स्थानांतरण पर विचार किया गया।
- सक्रिय प्रबंधन रणनीतियाँ: पर्यावास बहाली, वन्यजीव स्थानांतरण, भूदृश्य ससंयोजन (Landscape Connectivity) और आधुनिक निगरानी प्रोटोकॉल पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।
- सहयोग को बढ़ावा: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA), राज्य वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच आपसी समन्वय को और मजबूत करने का संकल्प लिया गया।
शीर्ष अधिकारियों और विशेषज्ञों के विचार
- संजय शर्मा (वन मंत्री, राजस्थान): उन्होंने राजस्थान में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में जमीनी प्रयासों और उपलब्धियों को साझा किया।
- एसपी यादव (महानिदेशक, इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस – IBCA): उन्होंने कहा कि सरिस्का में बाघों के पुनर्वास ने पूरी दुनिया में यह साबित कर दिया है कि सही वैज्ञानिक प्रबंधन से लुप्त हो चुकी आबादी को दोबारा जीवित किया जा सकता है।
- सुशील कुमार अवस्थी (वन महानिदेशक और विशेष सचिव): उन्होंने सरिस्का की वर्तमान स्थिति को बेहद उत्साहजनक बताते हुए इसे भविष्य में अन्य अभ्यारण्यों के लिए एक आदर्श स्रोत बताया।
- संजय कुमार (सदस्य सचिव, NTCA): उन्होंने सरिस्का के सफल मॉडल को ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की एक ऐतिहासिक और प्रमुख उपलब्धि करार दिया।
इस कार्यशाला से प्राप्त निष्कर्ष और सिफारिशें आने वाले समय में बाघों की कमी वाले अभ्यारण्यों के लिए एक प्रभावी और विज्ञान-आधारित संरक्षण योजना तैयार करने में मील का पत्थर साबित होंगी।