सत्संग आत्मजागरण, संस्कार और जीवन मूल्यों के संवर्धन का सशक्त माध्यम: राज्यपाल

जोधपुर/ नरेश गुनानी/जोधपुर के गांधी मैदान में सम्बोधि धाम द्वारा आयोजित 52 दिवसीय चातुर्मास आध्यात्मिक महोत्सव ‘जीने की कला’ प्रवचनमाला एवं लोक कल्याणकारी दिव्य सत्संग कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर राज्यपाल हरिभाऊ बागडे और केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने शिरकत की तथा राष्ट्रसंत ललितप्रभ सागर एवं राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ सागर का आशीर्वाद प्राप्त कर संतवाणी का लाभ उठाया।

सत्संग जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की जीवनदृष्टि: राज्यपाल

​कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि सत्संग केवल धार्मिक अनुष्ठानों या पौराणिक कथाओं के श्रवण तक सीमित नहीं है। श्रेष्ठ व्यक्तित्वों, ज्ञानवान आचार्यों और संतों का सान्निध्य जीवन में:

  • ​सकारात्मक परिवर्तन
  • ​नैतिक मूल्यों के संवर्धन
  • ​आत्मानुशासन
  • ​आत्मजागरण का मार्ग प्रशस्त करता है।

​उन्होंने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति में सत्संग को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, क्योंकि यह व्यक्ति के विचार, व्यवहार और चरित्र का परिष्कार कर समाज व राष्ट्र कल्याण का आधार बनता है।

​राष्ट्रसंत ललितप्रभ सागर एवं राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ सागर को नमन करते हुए राज्यपाल ने कहा कि दोनों आचार्यों ने भारतीय संस्कृति, श्रमण परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रसार के माध्यम से समाज को नई दिशा दी है। धर्म को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखकर जीवन जीने की कला, व्यक्तित्व निर्माण और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ना संत परंपरा की महान विशेषता है। उन्होंने संतों द्वारा हज़ारों किलोमीटर की पदयात्राओं के माध्यम से जन-जन तक सद्भाव, अहिंसा और आत्मानुशासन का संदेश पहुँचाने के प्रयासों की सराहना की।

​आदि शंकराचार्य द्वारा देश की चारों दिशाओं में स्थापित मठों का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि ये पीठ केवल आस्था के केंद्र नहीं थे, बल्कि राष्ट्रीय एकात्मता, सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान के व्यापक प्रसार के सशक्त माध्यम थे। इसी प्रकार श्रमण परंपरा की पदयात्राएँ समाज से सतत संवाद स्थापित कर जनकल्याण की भावना को सुदृढ़ करती हैं। उन्होंने सम्बोधि धाम के अंतरराष्ट्रीय सत्संग, साधना और सेवा केंद्र के रूप में किए जा रहे कार्यों की भी प्रशंसा की।

चातुर्मास आत्ममंथन और आत्मपरिवर्तन का महापर्व: केंद्रीय मंत्री

​केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने अपने संबोधन में कहा कि चातुर्मास केवल संतों के एक स्थान पर विराजमान होने का अवसर नहीं है, बल्कि यह:

  • आत्ममंथन
  • आत्मसंयम
  • आत्मपरिवर्तन
  • आत्मजागरण का महापर्व है।

​उन्होंने आगे कहा कि भारतीय मनीषा ने वर्षा ऋतु को केवल प्रकृति के पुनर्जीवन का काल नहीं माना, बल्कि इसे मनुष्य के भीतर ज्ञान, करुणा, विवेक और संयम के नवसंचार का भी पावन अवसर माना है।

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