लोकेंद्र सिंह शेखावत
भागलपुर, बिहार! मई 2014 से लेकर आज तक के सफर में जहाँ बुनियादी ढांचे और तकनीकी विकास के नए कीर्तिमान बने हैं, वहीं घरेलू बजट और बुनियादी जरूरतों के मोर्चे पर आम नागरिक आज भी एक मूक संघर्ष लड़ रहा है।
आज से ठीक 12 वर्ष पूर्व, देश के राजनीतिक और गौरवशाली इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा था। मई 2014 में जब आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी गुजरात की धरती छोड़ राष्ट्र की सेवा में उपस्थित हुए थे, तब देश की जनता ने बदलाव और एक सुदृढ़ आर्थिक भविष्य की उम्मीद में प्रचंड जनादेश दिया था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीते 12 वर्षों के लंबे सफर में भारत ने वैश्विक पटल पर मजबूत साख बनाई है, डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी है और राष्ट्रीय सुरक्षा व बुनियादी ढांचे (एक्सप्रेसवे, आधुनिक रेलवे) के मोर्चे पर अभूतपूर्व प्रगति की है। किंतु जब हम इस चमक-दमक के बीच आम जनमानस की मूलभूत आवश्यकताओं का धरातलीय मूल्यांकन करते हैं, तो एक कटु सत्य सामने आता है—महंगाई को स्थायी रूप से नियंत्रित करने में नीतियां पूर्णतः प्रभावी सिद्ध नहीं हो पाई हैं। यह एक स्थापित सत्य है कि कड़वी हकीकत हमेशा विचलित करती है, लेकिन आज समाज के एक बड़े हिस्से में यह सर्वविदित है कि महंगाई अपनी अदृश्य मार के कारण उच्चतम शिखर पर महसूस की जा रही है। भले ही थोक या खुदरा महंगाई के सरकारी आंकड़े सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, भारत सरकार के आधार पर तकनीकी उतार-चढ़ाव दिखाते हों, किंतु रसोईघर, बच्चों की स्कूल फीस और अस्पतालों के बिलों का व्यावहारिक सच इससे बिल्कुल अलग है। मध्यमवर्गीय परिवारों और निजी क्षेत्र का दोहरा संकटआज देश की रीढ़ माने जाने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों और निजी क्षेत्र के वेतनभोगी कर्मचारियों की स्थिति ‘आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया’ वाली हो चुकी है। इस वर्ग का संकट दोहरा है, वेतन में सुस्ती बनाम खर्चों में गति: निजी क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों कर्मचारियों की सालाना वेतन वृद्धि या तो रुकी हुई है या फिर एकल अंक के न्यूनतम स्तर पर सिमटी हुई है। इसके विपरीत, जीवनयापन की लागत में चक्रवर्ती दर से वृद्धि हुई है। सब्सिडी का अंत और छिपी हुई महंगाई:- एलपीजी सिलेंडर, पेट्रोल, डीजल और दैनिक परिवहन की बढ़ी हुई कीमतों ने आम आदमी की क्रय शक्ति को सोख लिया है। परिवहन महंगा होने का सीधा असर थाली में सजने वाली दालों, सब्जियों और दूध पर पड़ता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास: तीन मोर्चों पर मारआम आदमी का बजट सिर्फ भोजन से नहीं बिगड़ता, बल्कि उसकी सामाजिक सुरक्षा के तीन स्तंभों-शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास-पर होने वाले बेतहाशा खर्च से टूटता है:शिक्षा का व्यावसायीकरण: निजी स्कूलों की फीस, एडु-टेक प्लेटफॉर्म्स का बढ़ता चलन और किताबों-कॉपियों की आसमान छूती कीमतों ने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना एक वित्तीय बोझ बना दिया है। स्वास्थ्य पर भारी खर्च: सरकारी चिकित्सा तंत्र पर अत्यधिक दबाव के कारण मध्यम वर्ग को निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है। बिना किसी मजबूत मेडिकल इंश्योरेंस या बैकअप के, एक गंभीर बीमारी किसी भी हंसते-खेलते मध्यमवर्गीय परिवार को कर्ज के गहरे दलदल में धकेल देती है।आशियाने का बढ़ता किराया और समान मासिक किस्त: मेट्रो शहरों और कस्बों में रियल एस्टेट की कीमतों और होम लोन की ब्याज दरों में वृद्धि ने वेतनभोगी कर्मचारियों के मासिक बजट का संतुलन बिगाड़ दिया है।
बीते 12 वर्षों के सफर में जहां राष्ट्र ने समष्टि अर्थशास्त्र के पैमाने पर कई ऊंचाइयों को छुआ है, वहीं व्यष्टि अर्थशास्त्र यानी आम नागरिक के घर का बजट ‘त्राहि-त्राहि’ के दौर से गुजर रहा है। देश के इस व्यापक आर्थिक असंतुलन को पाटना अनिवार्य है। विकास की वास्तविक सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब देश के आर्थिक विकास का लाभांश सीधे तौर पर उस मध्यम वर्ग की जेब तक पहुंचे, जो ईमानदारी से टैक्स चुकाता है और देश के उपभोग चक्र को जीवित रखता है।