सच्चाई से भागती SECL: छाल उपक्षेत्र में वेलफेयर टीम का दौरा या ‘ऑल इज वेल’ का गिफ्टेड ड्रामा?

रूटीन जांच के नाम पर औपचारिकता का खेल, स्थानीय मीडिया के तीखे सवालों से बचती दिखी कोल इंडिया की संयुक्त समिति

​कुड़ेकेला / छाल /बुधराम अग्रवाल 

आखिर एसईसीएल (SECL) प्रबंधन और श्रमिक संगठनों को मीडिया से इतना परहेज क्यों है? क्या छाल उपक्षेत्र की खदानों और श्रमिक कॉलोनियों में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा, और इस बदहाली को छिपाने के लिए सिर्फ एक स्वांग रचा जा रहा है? ये सुलगते सवाल आज उस वक्त और गहरा गए, जब खुद को मजदूरों का हितैषी बताने वाली कोल इंडिया की वेलफेयर टीम छाल उपक्षेत्र के निरीक्षण पर पहुंची। लेकिन जमीनी हकीकत पर स्थानीय मीडिया के तीखे सवालों का सामना करने के बजाय, टीम और प्रबंधन ने ‘बायकाट’ का रास्ता चुनना ही बेहतर समझा।

​स्वागत-सत्कार भारी, पर बुनियादी मुद्दों से दूरी

​आज पांच प्रमुख श्रमिक यूनियनों के दिग्गज नेताओं की एक संयुक्त टीम नावपारा आवासीय कॉलोनी में हुए कार्यों और नवनिर्माण का जायजा लेने पहुंची थी। इस उच्च स्तरीय टीम में:

  • ​महेंद्र पाल सिंह (BMS)
  • ​बजरंगी साही (HMS)
  • ​राजेश शर्मा (AITUC)
  • ​प्रीतम नाथ पाठक (INTUC)
  • ​अमृत लाल विश्वकर्मा (CITU)

​जैसे ही यह भारी-भरकम टीम क्षेत्र में पहुंची, प्रबंधन ने ‘अतिथि देवो भव:’ की तर्ज पर स्वागत-सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। पलक-पावड़े बिछाए गए, गुलदस्ते भेंट किए गए और मान-मनुहार का लंबा दौर चला। लेकिन इस चमचमाती आवभगत के पीछे जो खेल चल रहा था, वह साफ तौर पर रूटीन जांच के नाम पर महज एक ‘कोरम’ पूरा करने जैसा प्रतीत हो रहा था।

​”आओ, स्वागत कराओ, गिफ्ट लो और चलते बनो”

​दौरे के दौरान अंदर की तस्वीरें और माहौल देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो सब कुछ पहले से ही ‘फिक्स’ था। सूत्रों के मुताबिक, टीम का यह दौरा जमीन पर कामगारों की बुनियादी समस्याओं को दूर करने के लिए कम और प्रबंधन की कमियों पर ‘ऑल इज वेल’ (सब ठीक है) का सर्टिफिकेट चिपकाने के लिए ज्यादा था। क्षेत्र में यह चर्चा आम रही कि आज का एजेंडा बेहद साफ था—आओ, शानदार स्वागत कराओ, अपना-अपना गिफ्ट पैकेट लो और बिना किसी जवाबदेही के चलते बनो।

​एक स्थानीय कामगार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया:

“हफ्तों से कॉलोनियों की नालियां जाम हैं, बिजली-पानी की किल्लत है। लेकिन नेताओं और अफसरों की गाड़ियों का काफिला सिर्फ उन्हीं रास्तों से गुजरा जिन्हें सुबह ही चमकाया गया था।”

 

​मीडिया से क्यों भागे मजदूरों के कथित ‘मसीहा’?

​सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि सब कुछ ठीक था, तो जमीनी हकीकत को परखने आई इस टीम ने स्थानीय मीडिया से मुखातिब होने से साफ इंकार क्यों कर दिया? चर्चाओं का बाजार गर्म है कि इसके पीछे कई बड़े डर थे:

  1. ​ज्वलंत मुद्दों का सामना: अगर टीम मीडिया के सामने आती, तो उसे छाल उपक्षेत्र की उन बुनियादी असुविधाओं और जर्जर आवासों के सवालों का सामना करना पड़ता, जिससे यहां के कामगार और उनके परिवार रोज जूझ रहे हैं।
  2. ​गिफ्ट पॉलिटिक्स का बेअसर होना: मीडिया के तीखे सवालों के सामने प्रबंधन द्वारा थमाए गए ‘गिफ्ट पैकेट्स’ की चमक फीकी पड़ जाती।
  3. ​सच्चाई उजागर होने का डर: यदि सच सामने आ जाता, तो प्रबंधन को ‘सब कुछ दुरुस्त है’ का वह तमगा नहीं मिल पाता, जिसके लिए यह पूरी पटकथा लिखी गई थी।

​जुगलबंदी बेनकाब, अब जवाब का इंतजार

​कोल इंडिया की यह वेलफेयर टीम भले ही कागजों पर कामगारों की बुनियादी सुविधाओं और मांगों को पूरा करने का प्रपोजल तैयार करने का दावा करे, लेकिन आज छाल उपक्षेत्र में जो नाटकीय दृश्य देखा गया, उसने यूनियन नेताओं और प्रबंधन की आपसी ‘जुगलबंदी’ को सरेआम बेनकाब कर दिया है।

​अब देखना यह होगा कि इस ‘गिफ्टेड’ दौरे के बाद क्या सचमुच नावपारा के आवासीय परिवारों की सुध ली जाती है, या यह दौरा भी सिर्फ एक और फाइलों में सिमट कर रह जाने वाला तमाशा बनकर रह जाएगा।

 

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