गौरव कोचर/लोकतंत्र केवल कानूनों और संहिताओं से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं की साख और जनता के भरोसे से चलता है जिन पर निष्पक्षता का दारोमदार है। जब चुनाव आयोग (ECI), केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), न्यायपालिका या अन्य नियामक संस्थाओं के फैसले विवादों के घेरे में आते हैं, तो पूरा लोकतांत्रिक ढांचा डगमगाने लगता है। आज सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाते हैं, लेकिन समस्या की जड़ केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है; इसका एक बड़ा कारण सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले ‘राजनीतिक ईनाम’ की वह पुरानी परंपरा है, जिसे किसी भी दौर की सरकार ने खत्म करने की गंभीर इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।

इतिहास गवाह है कि जब देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सेवानिवृत्ति के कुछ ही समय बाद सत्ताधारी दल से राज्यसभा पहुंचते हैं और केंद्रीय कैबिनेट में मंत्री बनते हैं, या किसी प्रमुख जांच एजेंसी के निदेशक रिटायरमेंट के तुरंत बाद किसी राज्य के राज्यपाल बना दिए जाते हैं, तब जनता के मन में यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या सेवाकाल के दौरान लिए गए फैसलों के पीछे भविष्य के किसी लाभ की उम्मीद छिपी थी? न्याय का यह मूलभूत सिद्धांत है कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। यही सिद्धांत जांच और चुनाव जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं पर भी लागू होता है।
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग और भारत के 21वें विधि आयोग ने इस विसंगति को दूर करने के लिए ठोस सिफारिशें की थीं। आयोगों का स्पष्ट मानना रहा है कि चुनाव आयुक्तों, जांच एजेंसी प्रमुखों और अर्ध-न्यायिक संस्थाओं के शीर्ष अधिकारियों के लिए कम से कम दो वर्ष का अनिवार्य ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ तय किया जाना चाहिए। इस अवधि के दौरान उनके किसी राजनीतिक दल में शामिल होने, चुनाव लड़ने या सरकार द्वारा किसी भी लाभ के पद पर नियुक्त होने पर पूर्ण पाबंदी होनी चाहिए। भारतीय संविधान में नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष के लिए सेवानिवृत्ति के बाद अन्य सरकारी पदों पर रोक की जो स्पष्ट व्यवस्था है, वैसी ही कड़ाई चुनाव आयोग और जांच प्रमुखों के लिए भी आवश्यक है।
दुर्भाग्य से, सरकारों ने इस दिशा में कभी कानून बनाने की ठोस पहल नहीं की। सत्ता में रहते हुए राजनीतिक दलों को सेवानिवृत्त नौकरशाहों का राजनीतिक पुनर्वास मुफीद लगता है, जबकि विपक्ष में आते ही वे संस्थागत स्वतंत्रता की दुहाई देने लगते हैं। यदि संस्थाओं को वास्तव में ‘पिंजरे का तोता’ बनने से बचाना है और चुनावी निष्पक्षता पर जनता का अटूट विश्वास बनाए रखना है, तो कूलिंग-ऑफ पीरियड को एक सख्त संवैधानिक नियम का रूप देना ही होगा। संस्थागत शुचिता भाषणों से नहीं, कानूनी सीमाओं और लक्ष्मण रेखाओं से सुरक्षित रहती है।