श्रीराम कथा विश्राम: अहंकार का त्याग और प्रभु की शरणागति ही मोक्ष का मार्ग — आचार्य डॉ. राजेश्वर

श्रीराम कथा विश्राम: अहंकार का त्याग और प्रभु की शरणागति ही मोक्ष का मार्ग — आचार्य डॉ. राजेश्वर

​जयपुर | 9 जनवरी, 2026

| योगेश शर्मा

​अजमेर रोड स्थित क्वींस कॉलोनी (नीलकंठ कॉलोनी) में श्री सरस निकुंज की पीठ बरसाना द्वारा आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा का शुक्रवार को भावपूर्ण समापन हुआ। यह कथा छोटे दादा गुरुदेव शुक संप्रदाय पीठाधीश रसिक माधुरी शरण महाराज की 127वीं जयंती के पावन उपलक्ष्य में, पीठाधीश्वर अलबेली माधुरी शरण महाराज के सान्निध्य में आयोजित की गई थी।

फ़ोटो टेलीग्राफ टाइम्स

​लंका दहन: अधर्म के विनाश का प्रतीक

​कथा के अंतिम दिवस व्यास पीठ से आचार्य डॉ. राजेश्वर ने लंका दहन और राम-रावण युद्ध का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने कहा कि लंका दहन केवल एक नगर का जलना नहीं था, बल्कि वह अधर्म, अन्याय और रावण के अहंकार के दहन का प्रतीक था। हनुमान जी द्वारा लंका को भस्म करना यह सिद्ध करता है कि जब एक भक्त निष्काम भाव से प्रभु की शरण में होता है, तो वह असंभव कार्य को भी सहजता से पूर्ण कर देता है।

​अभिमान ही पतन का मूल कारण

​आचार्य ने रावण के चरित्र के माध्यम से मनुष्य को सावधान करते हुए कहा:

​”रावण वेदों का ज्ञाता, अपार शक्तिशाली और महान शिव भक्त था, लेकिन उसके ‘अभिमान’ ने उसके विवेक को नष्ट कर दिया। दस शीश होने के बावजूद वह सत्य को नहीं पहचान सका। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो व्यक्ति इसमें डूब जाता है, उसका पतन सुनिश्चित है।”

 

​धर्म और अधर्म का महासंग्राम

​राम-रावण युद्ध की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि यह युद्ध दो राजाओं के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म का महासंग्राम था। प्रभु श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि जीत हमेशा सत्य, मर्यादा और करुणा की ही होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि जीवन में ‘अभियान’ नहीं, बल्कि ‘आत्मचिंतन’ आवश्यक है। प्रभु की शरणागति ही भक्त के उद्धार का एकमात्र मार्ग है।

​संतों और श्रद्धालुओं का सम्मान

​कथा विश्राम के अवसर पर श्री सरस निकुंज के प्रवक्ता प्रवीण बड़े भैया ने आयोजन में पधारे सभी संतजनों, विद्वानों और श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया और उन्हें सम्मानित किया। कथा के समापन पर आरती के दौरान पूरा परिसर ‘जय श्री राम’ के उद्घोष से गुंजायमान रहा।

​श्रद्धालुओं ने नम आंखों और श्रद्धापूर्ण भाव से कथा को विश्राम दिया तथा व्यास पीठ से मिले ज्ञान और मर्यादा के आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

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