श्रीकरणी कथा में भक्ति की बयार: पूर्व पहलवान महावीर कुमार सहदेव ने सपत्नीक किया करणी माता का अभिषेक
| योगेश शर्मा
जयपुर/बीकानेर। जस्सूसर गेट के बाहर स्थित मंदिर परिसर में आयोजित ‘श्रीकरणी कथा’ के दौरान सोमवार को भक्ति और श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिला। कथा के शुभारंभ से पूर्व करणी माता का विशेष अभिषेक एवं दशो दिशा, नवग्रह व यज्ञ पूजन संपन्न हुआ। इस विशेष अनुष्ठान में अखिल भारतीय माल्हा भारोत्तोलन संघ के प्रदेशाध्यक्ष एवं पूर्व पहलवान महावीर कुमार सहदेव ने सपत्नीक बैठकर मुख्य यजमान के रूप में पूजा-अर्चना की।
विद्वान पंडितों और गणमान्य जनों की उपस्थिति
कार्यक्रम का शुभारंभ करणी माता की महाआरती के साथ हुआ। पूजा की इस श्रृंखला में महावीर कुमार सहदेव के साथ छह अन्य जोड़ों ने भी आहुतियां दीं। इस अवसर पर मोहनलाल सांखला, अशोक सोनी, नत्थू सिंह भाटी, घेवर चंद सोनी और राजकुमार गिरी ने भी पूजा-अर्चना में सहभागिता की।
गौ-सेवा और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा है करणी कथा
कथा वाचक पंडित रविशंकर पारीक ने व्यासपीठ से माता के बाल्यकाल की लीलाओं का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने कहा कि:
- करणी माता का जीवन गौ-माता की सेवा के प्रति समर्पित था। उन्होंने बाल्यकाल से ही गौ-पूजन और गौ-चारण को अपनी दिनचर्या बनाया।
- माता के निर्देश पर ही तत्कालीन राजाओं और सेठों ने विशाल ओरण (संरक्षित वन क्षेत्र) छोड़े थे, जो आज भी पर्यावरण संरक्षण की मिसाल हैं।
- श्रीकरणी कथा हमें तालाब, कुआं, बावड़ी और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के साथ-साथ विवेक, धैर्य, तपस्या और त्याग की प्रेरणा देती है।
भक्ति संगीत और नानी बाई का मायरा
मीडिया प्रभारी महावीर कुमार सहदेव ने जानकारी दी कि कथा स्थल पर दोहरा आध्यात्मिक लाभ मिल रहा है। दोपहर 1:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक ‘श्रीकरणी कथा’ का वाचन हो रहा है, वहीं रात्रि 8:00 बजे से 10:00 बजे तक ‘नानी बाई का मायरा’ का संगीतमय वाचन पंडित रविशंकर पारीक द्वारा किया जा रहा है।
कार्यक्रम में गायक नंदकिशोर, पैड वादक दिनेश कुमार और ढोलक वादक मास्टर सुरेंद्र ने अपने भजनों और संगीत से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
31 दिसंबर को होगा महाप्रसाद का आयोजन
आयोजन समिति ने बताया कि इस आध्यात्मिक महोत्सव का समापन 31 दिसंबर को भव्य यज्ञ अनुष्ठान और विशाल महाप्रसादी के साथ होगा। समिति ने सभी धर्मप्रेमी जनता से अपील की है कि वे अधिक से अधिक संख्या में पधारकर कथा श्रवण करें और महाप्रसाद ग्रहण करें।