शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने का रहस्य:- बाबा-भागलपुर
| लोकेंद्र सिंह शेखावत
भागलपुर, बिहार। शिवलिंग पर बिल्व पत्र चढ़ाने का सर्वाधिक महत्व है। शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना भगवान शिव को प्रसन्न करने का सर्वोच्च उपाय है, जो समर्पण, शीतलता और त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक है। यह बेलपत्र व्यक्ति के तीन जन्मों के पापों का नाश करता है और सुख-समृद्धि लाता है।
इस सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पं. आर. के. चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर, भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने सुगमतापूर्वक बतलाया कि:- शिवलिंग पर हमेशा उलटा बेलपत्र/ बिल्व पत्र यानी चिकनी सतह की तरफ वाला भाग स्पर्श कराते हुए चढ़ाना चाहिए। बेलपत्र को हमेशा अनामिका, अंगूठे और मध्यमा अंगुली की मदद से चढ़ाएं। शिव जी को बिल्वपत्र अर्पण करने के साथ-साथ जल की धारा जरूर चढ़ाएं। बेलपत्र में चक्र और वज्र नहीं होना चाहिए।
ऐसी मान्यता है कि अगर कोई भक्त शिवलिंग पर सिर्फ बिल्व पत्र चढ़ाता है तो भी उसे शिव कृपा मिल सकती है। इस परंपरा का संबंध समुद्र मंथन से है। जब देवता और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो सबसे पहले हलाहल विष निकला था। इस विष को शिव जी अपने गले में धारण कर लिया था। विष के प्रभाव से शिव जी के शरीर में गर्मी बढ़ने लगी थी। उस समय सभी देवी-देवताओं ने शिव जी को बिल्व पत्र खिलाए थे। बिल्व पत्र विष का प्रभाव कम कर सकता है और शरीर की गर्मी को शांत करता है। बिल्व पत्र की वजह से शिव जी को शीतलता मिली थी। तभी से शिवलिंग पर बिल्व पत्र चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई है।
शिव पुराण के मुताबिक बिल्व का पेड़ शिव जी का ही एक स्वरूप है। इसे श्रीवृक्ष भी कहा जाता है। “श्री” लक्ष्मी जी का एक नाम है। इस कारण बिल्व की पूजा से लक्ष्मी जी की भी प्रसन्नता मिल सकती है। इस पेड़ की जड़ों में गिरिजा देवी, तने में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में देवी कात्यायनी का वास माना गया है।
शिव पुराण के मुताबिक बिल्व पत्र के बिना शिव पूजा पूरी नहीं मानी जाती है। बिल्व के पेड़ को शिवद्रुम कहा जाता है। बिल्व पत्र किसी भी माह, किसी भी पक्ष की चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी तिथि, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति और सोमवार को न तोड़ें। दोपहर के बाद भी बिल्व पत्र नहीं तोड़ना चाहिए। अगर इन तिथियों बिल्व पत्र की आवश्यकता हो तो एक दिन पहले ही ये पत्ते तोड़ लेना चाहिए। जैसे सोमवार को जरूरत हो तो रविवार को ही बिल्व पत्र तोड़कर रख लेना चाहिए।
शिवलिंग पर चढ़ाया गया बिल्व पत्र बासी नहीं माना जाता है। शिवलिंग पर चढ़े हुए बिल्व पत्र को धोकर फिर से पूजा में चढ़ाया जा सकता है। नए बिल्व पत्र न मिलने पर ऐसा कई दिनों तक किया जा सकता है।
