विशेष संक्षिप्त गहन पुनरीक्षण–2026: कदम नहीं रुके… हौसले नहीं टूटे

चुनौतियों के बीच चित्तौड़गढ़ के बीएलओं ने रचा समर्पण और सफलता का इतिहास**
नरेश गुनानी
जयपुर, 23 नवंबर।
राजस्थान में चल रहे विशेष संक्षिप्त गहन पुनरीक्षण–2026 (SIR) ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रदेश न केवल आंकड़ों में बल्कि जज़्बे, जिम्मेदारी और कार्य के प्रति समर्पण में भी अग्रणी है। इस सफलता के पीछे उन बीएलओं (बूथ लेवल अधिकारियों) की दृढ़ इच्छाशक्ति, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता है, जिन्होंने अपनी सीमाओं, चुनौतियों और स्वास्थ्यगत कठिनाइयों के बावजूद एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो पूरे प्रदेश को प्रेरणा देती है।
4 नवंबर से 4 दिसंबर तक चल रहे इस अभियान में चित्तौड़गढ़ जिले के कई बीएलओं ने 22 नवंबर तक ही 100 प्रतिशत ऑनलाइन अपडेट पूरा कर यह सिद्ध कर दिया कि जब लक्ष्य बड़ा हो, तो हौसले सभी बाधाओं को मात दे देते हैं।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवीन महाजन ने इन बीएलओं की निष्ठा को “अद्वितीय और अनुकरणीय” बताते हुए नागरिकों से भी अपील की है कि वे इस महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी में पूरा सहयोग दें।
1. सुनीता सोनी: बीमारी से संघर्ष… लेकिन लक्ष्य पर अडिग

राप्रावि गाडरियावास की शिक्षिका और भाग संख्या 171 की बीएलओ सुनीता सोनी लंबे समय से स्त्री-स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं। बावजूद इसके उन्होंने अपनी असुविधाओं को पीछे रखा और निर्वाचन कार्य को सर्वोपरि माना।
वे जिले की पहली महिला बीएलओ बनीं जिन्होंने निर्धारित समय से पूर्व शत-प्रतिशत ऑनलाइन अपडेट पूरा किया।
गाँव की बहुओं से संवाद बढ़ाने के लिए उन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप बनाया, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्रेम शर्मा के साथ प्रभावी टीमवर्क किया और कार्य को रणनीति के साथ आगे बढ़ाया।
उनका प्रेरक संदेश—
“रणनीति सही हो तो तनाव नहीं, सिर्फ उपलब्धि मिलती है।”
2. सूरजमल धाकड़: दिव्यांगता नहीं, दृढ़ता ने दी नई दिशा

राउप्रावि मायरा के शिक्षक और भाग सं. 218 के बीएलओ सूरजमल धाकड़ शारीरिक रूप से दिव्यांग होने के बावजूद जिले के सबसे तेज़ और शत-प्रतिशत कार्य पूर्ण करने वाले बीएलओ में शामिल रहे।
वे जिले के पहले दिव्यांग बीएलओ हैं जिन्होंने यह रिकॉर्ड बनाया।
90 प्रतिशत से अधिक मैपिंग पूर्व में ही कर लेने से कार्य सुगम रहा, लेकिन जहाँ फोटो उपलब्ध नहीं थे, वहाँ वे स्वयं जाकर समाधान लेकर लौटे।
उनकी प्रतिबद्धता की मिसाल—
“सीमाएँ शरीर की होती हैं, हौसले की नहीं।”
3. कोमल कटारिया: सिर्फ दो माह का अनुभव… लेकिन उपलब्धि सबसे आगे

राउप्रावि सूरजपोल की शिक्षिका और भाग सं. 93 की बीएलओ कोमल कटारिया को बीएलओ बने मात्र दो माह ही हुए थे।
अनुभव कम था, चुनौतियाँ अधिक थीं, सहयोग सीमित था—फिर भी उन्होंने संवाद, स्थानीय प्रभावी व्यक्तियों की भागीदारी और सामुदायिक जुड़ाव से सभी बाधाओं को पार करते हुए निर्धारित लक्ष्य समय से पहले प्राप्त कर लिया।
उनकी कहानी बताती है—
“नई भूमिका में भी जुनून पुरानी सीमाओं को तोड़ देता है।”
4. गोपाललाल शर्मा: दुर्घटना की चोटें भी रोक न सकीं जिम्मेदारी की राह

राउप्रावि रामाखेड़ा के शिक्षक और भाग सं. 19 के बीएलओ गोपाललाल शर्मा कुछ समय पूर्व दुर्घटना के कारण सिर और कमर दर्द से लगातार परेशान रहे।
शारीरिक पीड़ा के बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
मैपिंग के आधार पर फॉर्म तैयार किए, और जिन मतदाताओं की फोटो उपलब्ध नहीं थी, उनके घर जाकर फोटो लेकर आए।
उनका सकारात्मक संवाद और अनुभव इस चुनौतीपूर्ण समय में उनकी सबसे बड़ी शक्ति साबित हुआ।
5. देवकीनंदन वैष्णव: शहरी चुनौतियों के बीच तेज़ी और दक्षता का अद्भुत उदाहरण

शहरी क्षेत्र में माइग्रेशन, मजदूर वर्ग की आवाजाही, प्रवास और अन्य जटिलताएँ हमेशा बीएलओ के कार्य को कठिन बनाती हैं।
लेकिन भाग सं. 107 के बीएलओ देवकीनंदन वैष्णव ने इन चुनौतियों को अवसर में बदल दिया।
राउप्रावि कच्ची बस्ती के शिक्षक और अनुभवी स्काउटर होने के नाते उन्होंने बेहतरीन मैदानी समझ, रणनीति और तेज़ी का परिचय देते हुए 955 मतदाता गणना पत्र 21 नवंबर तक ही पूरा कर दिया।
बीएलओ – इन कदमों ने बढ़ाया चित्तौड़गढ़ का मान
इन पाँचों बीएलओं की परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं—
किसी के पास स्वास्थ्य चुनौती थी, कोई दिव्यांगता से जूझ रहा था, किसी के पास अनुभव कम था, तो किसी का क्षेत्र जटिल।
लेकिन एक चीज़ सभी में समान रही—
कर्तव्य के प्रति असाधारण समर्पण।
इन्हीं जज़्बे ने चित्तौड़गढ़ को राजस्थान के उत्कृष्ट जिलों में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यह कहानी सिर्फ आँकड़ों की नहीं—यह उस अदम्य साहस, इच्छाशक्ति और जिम्मेदारी की है जिसने सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया।