लोकेंद्र सिंह शेखावत
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद, जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बहुमत हासिल करने का दावा किया है, वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया है।
SIR (Special Intensive Revision): क्या यह ममता की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक थी?
ममता बनर्जी ने इस चुनाव में SIR (Special Intensive Revision) यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। उनके आरोपों के केंद्र में निम्नलिखित बिंदु हैं:
- नामों का विलोपन: बनर्जी का आरोप है कि SIR के दौरान लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। हालांकि, कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केवल 32 लाख नाम ही वापस जोड़े जा सके।
- ईवीएम और चुनाव आयोग पर हमला: उन्होंने चुनाव आयोग को “विलेन” करार देते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी के साथ मिलकर लोकतांत्रिक जनादेश को “लूटा” गया है।
- राजनीतिक प्रभाव: आलोचकों का मानना है कि केवल प्रक्रियात्मक खामियों (जैसे SIR) को हार का मुख्य कारण बताना जनता के बीच उनके “जनादेश के प्रति सम्मान” की छवि को नुकसान पहुँचा सकता है। जहां विपक्षी इसे ‘हार की हताशा’ कह रहे हैं, वहीं ममता इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ के खिलाफ संवैधानिक विरोध बता रही हैं।
ममता का इस्तीफ़ा देने से इनकार: क्या कहता है संविधान?
भारतीय संविधान के अनुसार, चुनाव में हार के बाद या बहुमत खोने पर मुख्यमंत्री का पद पर बने रहना एक जटिल कानूनी और नैतिक प्रश्न बन जाता है।
1. अनुच्छेद 164 (Article 164):
- संविधान के अनुच्छेद 164(2) के अनुसार, मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि कोई दल या गठबंधन सदन में बहुमत (Majority) खो देता है, तो मुख्यमंत्री को नैतिकता और संवैधानिक परंपरा के आधार पर इस्तीफ़ा देना होता है।
- राज्यपाल की भूमिका: राज्यपाल के पास यह शक्ति होती है कि यदि मुख्यमंत्री बहुमत खोने के बावजूद इस्तीफ़ा न दें, तो वह उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं। अनुच्छेद 164(1) स्पष्ट करता है कि मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री “राज्यपाल के प्रसादपर्यंत” (During the pleasure of the Governor) पद धारण करेंगे।
2. संवैधानिक परंपरा बनाम विरोध:
- ममता बनर्जी का तर्क है कि यह चुनाव “स्वतंत्र और निष्पक्ष” नहीं थे, इसलिए वह इस परिणाम को स्वीकार नहीं कर रही हैं।
- कानूनी विकल्प: यदि वह इस्तीफा नहीं देती हैं, तो राज्यपाल नई सरकार के गठन का रास्ता साफ करने के लिए उन्हें पद से हटा सकते हैं या राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) की सिफारिश कर सकते हैं।