विशेष रिपोर्ट: छत्तीसगढ़ में जातिगत समरसता का इतिहास और पिछड़ा वर्ग की संवैधानिक जागरूकता की आवश्यकता

| रिपोर्ट गणपत चौहान छत्तीसगढ़

रायपुर: छत्तीसगढ़ की धरती हमेशा से न्याय, समानता और सामाजिक सुधारों की गवाह रही है। मंडल आयोग के लागू होने से पहले तक पिछड़ा वर्ग अपनी पहचान को लेकर जिस असमंजस में था, उसने समाज के एक बड़े हिस्से को जातिगत भेदभाव के मकड़जाल में उलझाए रखा। लेकिन समय-समय पर राज्य के महापुरुषों ने इस जड़ता को तोड़ने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाए हैं।

फ़ोटो टेलीग्राफ टाइम्स

सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार: अनंतराम बर्छिहा और डॉ. खूबचंद बघेल का योगदान

​छत्तीसगढ़ी समाज में एक समय ऐसी भ्रांतियां फैलाई गई थीं, जिससे वर्गों के बीच दूरी बनी रहे। इन कुरीतियों को जड़ से मिटाने की शुरुआत ग्राम चंदखुरी से हुई। जब कुर्मि समाज के अनंतराम बर्छिहा ने सामाजिक समरसता का परिचय देते हुए सतनामी मुहल्ले में केश कर्तन किया, तो उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा।

​इस घटना से व्यथित होकर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के प्रणेता डॉ. खूबचंद बघेल ने ‘ऊँचनीच’ नामक नाटक लिखा। चंदखुरी में मंचित इस नाटक ने जनमानस की चेतना को इस कदर झकझोरा कि पंचायत बुलाकर बर्छिहा को ससम्मान मुख्य धारा में वापस लाया गया। बघेल का मिनीमाता को अपनी बहन मानकर राखी बंधवाना भी सामाजिक समरसता का एक अप्रतिम उदाहरण है।

फ़ोटो टेलीग्राफ टाइम्स

कला और राजनीति के माध्यम से संदेश

​जातिगत भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए मनु नायक ने पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘कहि देबे संदेश’ बनाई। भारी विरोध के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसके सामाजिक महत्व को समझते हुए इसे रिलीज करवाया। इसी कड़ी में, वर्ष 2003 में भूपेश बघेल द्वारा निकाली गई ‘गांधी विचार यात्रा’ ने पाटन क्षेत्र के गांवों में पदयात्रा कर और दलित बस्तियों में भोजन ग्रहण कर भेदभाव की दीवारों को गिराने का काम किया।

महापुरुषों की विरासत: मनखे-मनखे एक समान

​छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक नींव बाबा गुरु घासीदास के संदेश “मनखे मनखे एक समान” और शहीद वीर नारायण सिंह के त्याग पर टिकी है। यही कारण है कि आज अन्य राज्यों की तुलना में यहाँ जातिगत विद्वेष नगण्य है।

आरक्षण और योग्यता का भ्रम

​आज भी समाज में ‘कोटा’ और ‘योग्यता के हनन’ जैसे शब्दों के माध्यम से पिछड़े वर्ग के युवाओं को भ्रमित किया जा रहा है। ऐतिहासिक रूप से देखें तो कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहू जी महाराज ने 1902 (ब्रिटिश काल) में ही आरक्षण की नींव रखी थी। ज्योतिबा फूले और सावित्री बाई फूले ने पिछड़ों और महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार खोले थे।

​विडंबना यह है कि जब सवर्ण वर्ग को आरक्षण मिलता है, तो विरोध नहीं होता, लेकिन पिछड़े वर्ग को मिलने वाले 27 प्रतिशत आरक्षण पर विवाद खड़ा किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक समरसता के लिए सभी वर्गों को एक-दूसरे के अधिकारों का समर्थन करना चाहिए।

डॉ. अंबेडकर और अनुच्छेद 340 का महत्व

​लेख का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पिछड़ा वर्ग आज भी अपने वास्तविक इतिहास और संवैधानिक अधिकारों से अनभिज्ञ है। भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने अनुच्छेद 340 के माध्यम से पिछड़े वर्गों के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया था।

एससी एसटी ओबीसी मोर्चा इंजीनियर कौशल वर्मा सभा को सम्बोधित करते हुए

​”जिस दिन पिछड़ा वर्ग बाबासाहेब की विचारधारा और संविधान की शक्ति को आत्मसात कर लेगा, उसी दिन देश में एक नई क्रांति का सूत्रपात होगा और भारत शोषणमुक्त बनेगा।”

 

​ छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढ़ी को इन ऐतिहासिक संघर्षों से सीख लेते हुए पूर्वजों द्वारा स्थापित समरसता की परंपरा को आगे बढ़ाना होगा। सामाजिक समानता केवल कानून से नहीं, बल्कि वैचारिक परिवर्तन से संभव है।

spot_imgspot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related

पीआईईटी में ‘आईट्रिपलई दिल्ली सेक्शन कांग्रेस’ का भव्य आयोजन: तकनीक और नेतृत्व का अनूठा संगम

पीआईईटी में 'आईट्रिपलई दिल्ली सेक्शन कांग्रेस' का भव्य आयोजन:...