विभाजन की विभीषिका से विस्थापन की अमरगाथा तक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

जयपुर/ नरेश गुनानी/सिन्धु शोध पीठ द्वारा विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में ‘‘विभाजन की विभीषिका से विस्थापन की अमर गाथा तक’’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन अजमेर स्थित महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय में किया गया।

​कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए विभाजन के दर्द, विस्थापित समाज के पुरुषार्थ और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान पर प्रकाश डाला।

​विभाजन: केवल भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक आत्मा का विघटन

​विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम एक दीर्घकालिक जन आंदोलन था, लेकिन इसकी परिणति भारत विभाजन की अकल्पनीय त्रासदी के रूप में हुई।

  • द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रभाव: यह केवल सीमाओं का विभाजन नहीं था, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक और सामाजिक आत्मा का विघटन था।
  • विभाजन की विभीषिका: 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने से ठीक एक दिन पहले 14 अगस्त को पाकिस्तान अस्तित्व में आया और इसके साथ ही इतिहास की सबसे भीषण मानवीय त्रासदियों में से एक की शुरुआत हुई।
  • सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र: बंगाल, पंजाब और सिंध प्रांत इससे सबसे अधिक प्रभावित हुए। सिंध पूरी तरह अलग हो गया, जिससे सिंधी समाज को अपनी जन्मभूमि, घर-बार और संपत्ति छोड़नी पड़ी।

​नई पीढ़ी को पूर्वजों के पुरुषार्थ और इतिहास से जोड़ने का आह्वान

​वासुदेव देवनानी ने जोर देकर कहा कि अपने इतिहास को भूलने वाली संस्कृति नष्ट हो जाती है:

  • विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने 2021 में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में घोषित किया था, ताकि उस त्रासदी में अपनी जान गंवाने वालों और पीड़ित लाखों लोगों को सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सके।
  • संस्कार और जड़ें: आज के एआई (AI) युग में भी युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। खाली समय में दादा-दादी और नाना-नानी के साथ बैठकर अपने पूर्वजों के इतिहास और संघर्ष को समझना चाहिए।
  • संग्रहालय एवं स्मृति: विभाजन की स्मृतियों और कहानियों को सहेजने के लिए अमृतसर और दिल्ली में ‘पार्टिशन म्यूजियम’ स्थापित किए गए हैं।

​विस्थापित समाज का संघर्ष और राष्ट्र निर्माण में योगदान

​विभाजन के दंश के बावजूद विस्थापित समाज के समर्पण की सराहना करते हुए उन्होंने कहा:

​”विभाजन ने हमें तोड़ा जरूर, लेकिन हमने हार नहीं मानी। विस्थापित समाज ने अपने परिश्रम, प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति से न केवल स्वयं को दोबारा स्थापित किया, बल्कि देश के विकास और राष्ट्र निर्माण में भी अग्रणी भूमिका निभाई।”

 

​उन्होंने महान क्रांतिकारी हेमु कालाणी के बलिदान का स्मरण कराते हुए कहा कि सिंधी समाज सदैव कर्मशील और राष्ट्रहित के लिए समर्पित रहा है।

​महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय में सिंधी साहित्य का होगा अनुवाद

​सिंधी भाषा और साहित्य के संरक्षण पर विचार व्यक्त करते हुए देवनानी ने एक महत्वपूर्ण पहल की घोषणा की:

  • साहित्यिक धरोहर का संरक्षण: सिंधी भाषा और साहित्य हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • पुस्तकों का अनुवाद: महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय में सिंधी भाषा की उत्कृष्ट पुस्तकों का अनुवाद कराया जाएगा, जिससे शोधार्थियों, विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों को सिंधी साहित्य की समृद्ध परंपरा को समझने का अवसर मिलेगा।

​अन्य प्रमुख वक्ताओं के विचार

  • डॉ. राजेश व्यास (अतिरिक्त निदेशक, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग): उन्होंने कहा कि विभाजन केवल भौगोलिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक था, जिसके तहत कश्मीर की प्रसिद्ध शारदा पीठ भी पीओके में चली गई। इसके बावजूद भारत ने अपनी सनातन संस्कृति को जीवित रखा।
  • प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल (कुलगुरु): उन्होंने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास, सामाजिक योगदान और संघर्ष पर अपने विचार साझा किए।
  • प्रो. सुभाष चन्द्र (निदेशक, सिन्धु शोध पीठ): उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे इतिहास से सीख लेते हुए ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति न होने दें और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान दें।
  • सुरेश सिंधी (सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी): उन्होंने विस्थापन से जुड़े अपने परिवार के संस्मरण और व्यक्तिगत अनुभव साझा किए।

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