रिपोर्ट योगेश शर्मा
जयपुर। राष्ट्र की आत्मा और स्वतंत्रता संग्राम की चेतना के प्रतीक ‘वंदे मातरम’ की आधिकारिक लिपि (लिरिक्स) को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। राष्ट्रपति से सम्मानित नैतिक शिक्षाविद एवं आध्यात्मिक चिंतक आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया ने भारत सरकार के गृह मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय की वेबसाइटों पर प्रकाशित राष्ट्रगीत के शब्दों और संरचना में विसंगतियों को उजागर किया है।
मंत्रालयों की वेबसाइटों पर अलग-अलग शब्द
जयपुर में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान आचार्य पाटोदिया ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्र सरकार के दो प्रमुख मंत्रालयों—गृह मंत्रालय और कला व संस्कृति मंत्रालय—की आधिकारिक वेबसाइटों पर राष्ट्रगीत की जो लिपि उपलब्ध है, उनमें शब्दों का अंतर है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रगीत जैसे संवेदनशील और गौरवपूर्ण विषय पर त्रुटि न केवल ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अन्याय है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय अस्मिता का भी अपमान है।”
इस अवसर पर नृत्य गुरु व अभिनेत्री उषाश्री, डॉ. अमित पाटोदिया, बृज किशोर श्रीवास्तव, अंतरराष्ट्रीय गायक मुन्ना लाल भाट और मुरलीधर पाटोदिया सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
150 वर्ष पूरे होने पर भी कमियां चिंताजनक
आचार्य पाटोदिया ने रेखांकित किया कि 7 नवंबर 2025 को वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। एक ओर जहां पूरा देश इस ऐतिहासिक विरासत का उत्सव मना रहा है, वहीं दूसरी ओर आधिकारिक दस्तावेजों में इस तरह की भिन्नता होना दुखद है।
उन्होंने बताया कि इन त्रुटियों को सुधारने के लिए उन्होंने निरंतर प्रयास किए हैं:
- मंत्रालयों को सूचना: इस विषय को संबंधित केंद्रीय मंत्रियों के संज्ञान में लाने का प्रयास किया गया, लेकिन अभी तक कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली है।
- दिल्ली में व्यक्तिगत संपर्क: 15 अप्रैल 2026 को आचार्य पाटोदिया ने नई दिल्ली स्थित ‘कर्तव्य भवन’ में संबंधित अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से मिलने का प्रयास किया, ताकि इन विसंगतियों के प्रमाण सौंपे जा सकें, लेकिन संवाद स्थापित नहीं हो सका।
शुद्ध स्वरूप को डिजिटल माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने की पहल
त्रुटियों को दूर करने और आमजन को राष्ट्रगीत के सही स्वरूप से अवगत कराने के लिए आचार्य पाटोदिया ने ‘वंदे मातरम’ के संपूर्ण संस्करण को स्वरबद्ध कर अपने यूट्यूब चैनल ‘आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया’ पर डिजिटल रूप से उपलब्ध कराया है। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्वयं सही शब्दावली के साथ गीत गाकर सुनाया और उपस्थित लोगों को इसकी सैकड़ों प्रतियां भी वितरित कीं।
ऐतिहासिक महत्व और राष्ट्रीय गौरव
गौरतलब है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत को 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा द्वारा राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया था। 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह गीत क्रांति का उद्घोष बना था।
उल्लेखनीय है कि आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया को उनके सामाजिक और नैतिक योगदान के लिए 2 मई 2025 को भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। अब उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि इन डिजिटल त्रुटियों को तत्काल सुधार कर राष्ट्रगीत की एक समान और शुद्ध लिपि सभी सरकारी पोर्टलों पर सुनिश्चित की जाए।