लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से भारत वापस लाने की तैयारी: 11वीं सदी की मां सरस्वती की प्रतिमा का भोजशाला से है ऐतिहासिक संबंध
विशेष रिपोर्ट | प्रीति बालानी
लंदन स्थित प्रतिष्ठित ब्रिटिश म्यूजियम में रखी 11वीं सदी की मां सरस्वती (वाग्देवी) की अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ प्रतिमा को स्वदेश वापस लाने के लिए प्रयास तेज कर दिए गए हैं। हरियाणा सरस्वती हेरिटेज विकास बोर्ड ने इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को पुनः भारत की पावन धरा पर स्थापित करने के लिए कूटनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया को गति दी है।
परमार काल और भोजशाला से जुड़ा गौरवशाली इतिहास
यह प्रतिमा 11वीं सदी के परमार राजवंश के महान शासक राजा भोज के शासनकाल की है। इसका मूल स्थान मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर माना जाता है। कला और स्थापत्य की दृष्टि से यह प्रतिमा अद्वितीय है:
- निर्मिति: यह प्रतिमा श्वेत संगमरमर से निर्मित है और उस काल की उत्कृष्ट मूर्तिकला का बेजोड़ नमूना प्रस्तुत करती है।
- दुर्लभ शिलालेख: प्रतिमा पर संस्कृत और देवनागरी लिपि में दुर्लभ अभिलेख उत्कीर्ण हैं।
- शोध के नए आयाम: विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रतिमा भारत वापस आती है, तो इन शिलालेखों पर गहन पुरातात्विक शोध किया जाएगा। इससे प्राचीन सरस्वती नदी, तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े कई नए ऐतिहासिक तथ्य उजागर हो सकते हैं।
बोर्ड की योजना और भावी उद्देश्य
हरियाणा सरस्वती हेरिटेज विकास बोर्ड ने इस सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और पुनर्स्थापना के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है:
- जन-दर्शन के लिए प्रदर्शन: प्रतिमा के स्वदेश लौटने पर इसे सबसे पहले सरस्वती नदी सभ्यता से जुड़े प्रमुख ऐतिहासिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में जन-दर्शन हेतु प्रदर्शित किया जाएगा।
- सरस्वती संग्रहालय में प्रतिष्ठापन: अंतिम रूप से इस पावन प्रतिमा को हरियाणा में निर्मित किए जा रहे अत्याधुनिक सरस्वती संग्रहालय में पूर्ण आदर एवं सम्मान के साथ स्थापित किया जाएगा।
राष्ट्रीय और सांस्कृतिक दायित्व
सरस्वती हेरिटेज विकास बोर्ड के अनुसार, सरस्वती नदी के तटों पर पल्लवित हुई सभ्यता भारतीय इतिहास, अध्यात्म और ज्ञान परंपरा की आधारशिला रही है। ऐसे में ब्रिटिश काल या उससे पूर्व विदेश ले जाई गई ऐसी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों को पुनः देश में लाना न केवल ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।
प्रतिमा की वापसी को लेकर जारी यह पहल न केवल मध्य प्रदेश और हरियाणा, बल्कि पूरे देश के इतिहास-प्रेमियों और श्रद्धालुओं के लिए एक अत्यंत उत्साहजनक कदम मानी जा रही है।