राष्ट्रपति भवन की परंपराओं और समावेशी लोकतंत्र को दर्शाती सचित्र पुस्तकों का लोकार्पण; चार वर्षों की सेवा यात्रा पर राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति का संबोधन

नई दिल्ली/ प्रीति बालानी/राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष गरिमामय कार्यक्रम में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के कार्यकाल और राष्ट्रपति भवन की परंपराओं, कार्य-प्रणालियों एवं बहुआयामी स्वरूप पर केंद्रित सचित्र संकलनों (पुस्तकों) का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु और उपराष्ट्रपति ने अपने विचार व्यक्त किए और भारत के समावेशी लोकतंत्र की शक्ति पर बल दिया।

​राष्ट्रपति का संबोधन: “कर्तव्य-भावना और जन-सेवा के चार वर्ष”

​अपने संबोधन में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि लोकार्पित पुस्तकों के शीर्षक समावेशी लोकतंत्र में हमारी अटूट आस्था को परिलक्षित करते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ये प्रकाशन पाठकों को राष्ट्रपति भवन की समृद्ध परंपराओं से परिचित कराएंगे और देशवासियों को अपनी विरासत पर गर्व करते हुए प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे।

  • दायित्व और कर्तव्य की भावना: राष्ट्रपति ने स्मरण किया कि जब उन्होंने 25 जुलाई, 2022 को पदभार ग्रहण किया था, तब यह उनके लिए महज एक सम्मान नहीं, बल्कि अत्यंत गंभीर दायित्व था। उन्होंने पिछले चार वर्षों में इसी कर्तव्य-भावना के साथ देश की सेवा की है।
  • समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद:
    • युवा: नैतिक मूल्यों से जुड़कर देश और समाज की उन्नति के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा।
    • महिलाएं: स्वावलंबी बनने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का आह्वान।
    • जनजातीय समाज: सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए विकास की मुख्य धारा में सक्रिय भागीदारी का अनुरोध।
    • प्रवासी भारतीय: विदेश यात्राओं के दौरान भारतीय समुदाय से भेंट कर भारत की विकास यात्रा में योगदान देने का संदेश।

​उपराष्ट्रपति का वक्तव्य: “भारतीय लोकतंत्र के समावेशी स्वरूप का प्रतीक”

​कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के नेतृत्व, शालीनता और संवैधानिक प्रतिबद्धता की भूरी-भूरी प्रशंसा की।

​”ओडिशा के एक दूरवर्ती जनजातीय गांव के साधारण परिवेश से लेकर भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की जीवन-यात्रा अत्यंत प्रेरणादायक है। यह यात्रा भारतीय लोकतंत्र की अपार शक्ति और उसके समावेशी स्वरूप का सजीव प्रमाण है।”

उपराष्ट्रपति

 

​उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि झारखंड की राज्यपाल के रूप में उनके कार्यकाल को राज्यभर के लोग आज भी बड़े स्नेह, सम्मान और प्रशंसा के साथ याद करते हैं।

​राष्ट्रपति भवन की प्रमुख जनकेंद्रित एवं ऐतिहासिक पहलें

​उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति भवन को ‘जन-जन के निकट’ लाने और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने वाली प्रमुख पहलों को रेखांकित किया:

  • जन-सामान्य के लिए द्वार खोलना: अमृत उद्यान, राष्ट्रपति निकेतन और राष्ट्रपति तपोवन को आम जनता के लिए सुलभ बनाया गया।
  • दिव्यांगजन-अनुकूल परिसर: राष्ट्रपति भवन को अधिक दिव्यांगजन-अनुकूल स्वरूप दिया गया।
  • ऐतिहासिक महापुरुषों का सम्मान: राष्ट्रपति भवन में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी की प्रतिमा स्थापित की गई।
  • भाषाई एवं सांस्कृतिक संरक्षण: संथाली भाषा में ओल चिकी लिपि में भारत के संविधान का प्रकाशन एक ऐतिहासिक कदम रहा, जिसने जनजातीय समाज को गौरव का अनुभव कराया और भाषाई विरासत को मजबूती दी।

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