गणपत चौहान
- उद्योगों के साए में सिमट रही हरियाली: भारी मशीनों से कीमती और विशाल वृक्षों का सफाया
- मीडिया के पहुंचते ही खुली पोल, मौके पर मिले कटी लकड़ियों के व्यवस्थित लट्ठे और ढुलाई के निशान
- उद्योग प्रबंधन से साठगांठ का आरोप: वन पट्टा अधिनियम के तहत ग्रामीणों को मिली लीज की जमीन पर खेल की आशंका
- प्रशासनिक अमले में हड़कंप: डीएफओ और एसडीएम के निर्देश पर वन व राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने शुरू की जांच
रायगढ़। उद्योगों की चिमनियों के साए में सिमटती हरियाली को उजाड़ने का सिलसिला रायगढ़ जिले में थमने का नाम नहीं ले रहा है। विकास और रोजगार के नाम पर पहले जंगलों का सफाया कर उद्योग स्थापित किए गए, और अब उन्हीं उद्योगों के आसपास बचे-खुचे हरे-भरे जंगल भी धीरे-धीरे माफिया और औद्योगिक साठगांठ की भेंट चढ़ रहे हैं। ताजा सनसनीखेज मामला गेरवानी क्षेत्र के शिवपुरी–देलारी के बीच स्थित संरक्षित जंगल का है, जहां इन दिनों साल, सरई और महुआ जैसे बेहद कीमती एवं विशाल वृक्षों की आधुनिक मशीनों से गुपचुप कटाई किए जाने का मामला उजागर हुआ है।

मीडिया की दबिश से उजागर हुआ भयावह मंजर
क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वृक्षों की अवैध कटाई की गुप्त सूचना मिलने पर जब मीडिया प्रतिनिधि धरातल पर सच जानने मौके पर पहुंचे, तो वहां का दृश्य बेहद भयावह था। जंगल के बीचों-बीच कई विशाल और सदियों पुराने वृक्ष जमींदोज पड़े थे। यही नहीं, कटाई को छुपाने और ठिकाने लगाने के उद्देश्य से सैकड़ों कीमती लकड़ियों के लट्ठे काटकर बेहद व्यवस्थित ढंग से जमा कर रखे गए थे। मौके पर भारी मशीनों के चलने और कटी हुई लकड़ियों की ढुलाई के गहरे निशान साफ दिखाई दे रहे थे, जो इस बात का गवाह हैं कि यह खेल लंबे समय से चल रहा था।
ग्रामीणों की लीज भूमि और उद्योग प्रबंधन के बीच कथित समझौते का खेल
स्थानीय ग्रामीणों और पुख्ता सूत्रों ने दबी जुबान में एक बड़ा दावा किया है। उनके अनुसार, जिस भूमि पर यह अंधाधुंध कटाई की जा रही है, वह वास्तव में ‘वन पट्टा अधिनियम’ के तहत स्थानीय ग्रामीणों को लीज (पट्टे) पर आवंटित की गई है। आरोप है कि एक स्थानीय उद्योग प्रबंधन द्वारा अपने पैर पसारने और विस्तार करने के लिए इन संबंधित जमीनधारकों से पर्दे के पीछे कथित तौर पर मोटी रकम का समझौता कर लिया गया है। हालांकि, इस लेन-देन के कोई दस्तावेजी प्रमाण अब तक आधिकारिक रूप से सामने नहीं आए हैं, लेकिन क्षेत्र के कई लोगों ने एक स्वर में इस सांठगांठ की पुष्टि की है।
उद्योग प्रबंधन ने झाड़ा पल्ला, वन विभाग ने बैठाई जांच
जब इस पूरे गंभीर मामले को लेकर संबंधित उद्योग प्रबंधन से सीधा संपर्क साधा गया, तो उन्होंने हमेशा की तरह रणनीतिक रूप से पल्ला झाड़ लिया। प्रबंधन ने जमीन पर अवैध कब्जा करने और पेड़ों की कटाई कराने, दोनों ही संगीन आरोपों से साफ इंकार कर दिया।
उद्योग प्रबंधन के इंकार के बाद मामले की पूरी वस्तुस्थिति और साक्ष्य वन विभाग के आला अधिकारियों के समक्ष रखे गए। सूचना मिलते ही वन मंडलाधिकारी (डीएफओ) रायगढ़ अरविन्दम् एमपी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल रेंजर और वन अमले को दलबल के साथ मौके के लिए रवाना किया। वहीं, दूसरी ओर राजस्व विभाग भी हरकत में आया और उपखंड अधिकारी (एसडीएम) के कड़े निर्देश पर हल्का पटवारी तथा अन्य राजस्व कर्मचारियों की टीम जांच और जब्ती की कार्रवाई के लिए घटना स्थल पर पहुंची।
जिम्मेदार अधिकारियों के आधिकारिक बयान
“मामले की सूचना मिलते ही वन विभाग की विशेष टीम को तत्काल मौके पर भेजा गया है। मौके की पैमाइश और नुकसान का आकलन किया जा रहा है। यदि जांच में वन अधिनियम के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित दोषियों पर नियमानुसार सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”
— अरविन्दम् एमपी, डीएफओ, रायगढ़
“राजस्व और वन विभाग की संयुक्त टीम पूरे मामले की बारीकी से जांच कर रही है। विवादित जमीन की वास्तविक स्थिति, उसके स्वामित्व और वहां की गई कटाई की वैधानिकता की जांच की जा रही है। रिपोर्ट आते ही आवश्यक और दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”
— एसडीएम, रायगढ़
पर्यावरण संरक्षण के दावों पर खड़े हुए गंभीर सवाल
जंगल कटाई के इस ताजे मामले ने एक बार फिर जिला प्रशासन और पर्यावरण संरक्षण का दम भरने वाले जिम्मेदार तंत्र की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल उठ रहा है कि आखिर जिम्मेदार अमले की नाक के नीचे इतने बड़े पैमाने पर भारी मशीनों से जंगल कैसे उजाड़े जा रहे थे? और यदि ग्रामीणों को कृषि या आजीविका के लिए दी गई पट्टे की जमीन का उपयोग उद्योगों के अवैध विस्तार के लिए हो रहा है, तो इसकी मौन अनुमति किस स्तर पर दी गई?
फिलहाल, प्रशासनिक और विभागीय जांच की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, लेकिन अब देखना यह होगा कि यह कार्रवाई केवल कागजी खानापूर्ति और पंचनामे तक सीमित रहती है या वास्तव में प्रकृति का सीना छलनी करने वाले रसूखदारों पर प्रशासन का कानूनन शिकंजा कसता है।