रायगढ़ डिग्री कॉलेज में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन बनी शोपीस; छात्राओं को नहीं मिल रहा लाभ, प्रबंधन की लापरवाही उजागर

गनपत चौहान 

रायगढ़। “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” और महिला सशक्तिकरण जैसे बड़े-बड़े अभियानों और दावों के बीच रायगढ़ के एक प्रमुख डिग्री कॉलेज में छात्राओं की मूलभूत और जरूरी आवश्यकताओं की अनदेखी का एक गंभीर मामला सामने आया है। कॉलेज परिसर में छात्राओं की सुविधा के लिए लगाई गई सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन महीनों से बंद पड़ी है। उचित रखरखाव और देखरेख के अभाव में अब यह मशीन सिर्फ एक शोपीस बनकर रह गई है।

​हाल ही में सामने आई तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि मशीन पर धूल जमी हुई है और वह पूरी तरह से बदहाल स्थिति में पहुंच चुकी है।

​संवेदनशील विषय पर कॉलेज प्रबंधन की उदासीनता

​महिला स्वास्थ्य और मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) जैसे बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर कॉलेज प्रबंधन का यह उदासीन रवैया छात्राओं के लिए बड़ी परेशानी का सबब बन रहा है। कॉलेज की छात्राओं का कहना है कि कैंपस में आपात स्थिति (Emergency) के दौरान उन्हें सेनेटरी नैपकिन के लिए भटकना पड़ता है।

​छात्राओं ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि जिस उद्देश्य के साथ इस मशीन को कॉलेज परिसर में स्थापित किया गया था, वह पूरी तरह से फेल साबित हो रहा है। कई बार कॉलेज प्रशासन से इसे ठीक कराने और चालू करने की शिकायत की गई, लेकिन नतीजा सिफ़र रहा।

​स्वास्थ्य, आत्मसम्मान और पढ़ाई से जुड़ा है मामला

​विशेषज्ञों का मानना है कि शैक्षणिक संस्थानों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन और डिस्पोजल सिस्टम का होना केवल एक अतिरिक्त सुविधा नहीं है, बल्कि यह छात्राओं के स्वास्थ्य, उनके आत्मसम्मान और नियमित उपस्थिति से जुड़ा एक अनिवार्य विषय है।

विशेषज्ञों की राय: कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में यह साबित हो चुका है कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता और आवश्यक संसाधनों की कमी के कारण छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित होती है। उचित सुविधा न मिलने पर छात्राओं की कॉलेज में उपस्थिति घटने लगती है, जिसका सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक प्रदर्शन पर पड़ता है।

 

​पुरस्कार पाने वाले जिले में ऐसी अनदेखी पर उठे सवाल

​इस पूरे मामले में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि रायगढ़ जिले को समय-समय पर महिलाओं और बेटियों के सम्मान व उनके कल्याण के लिए विभिन्न मंचों पर सराहा और पुरस्कृत किया गया है। लेकिन उसी जिले के एक उच्च शिक्षण संस्थान में जमीनी हकीकत इसके उलट दिखाई दे रही है।

​इस अव्यवस्था को लेकर अब छात्राओं के साथ-साथ अभिभावकों में भी आक्रोश है। उन्होंने मांग की है कि कॉलेज प्रबंधन तत्काल संज्ञान लेते हुए इस वेंडिंग मशीन को चालू करवाए और इसमें नियमित रूप से नैपकिन की उपलब्धता सुनिश्चित करे, ताकि छात्राओं को किसी भी तरह की मानसिक या शारीरिक असुविधा का सामना न करना पड़े।

एजेंसी सवाल: अब बड़ा सवाल यह उठता है कि जब शासन और प्रशासन के स्तर पर महिला स्वच्छता और जागरूकता के लिए लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, तब जमीनी स्तर पर इन मशीनों और व्यवस्थाओं की निगरानी कौन करेगा? अगर छात्राओं के उपयोग के लिए लगाई गई मशीनें सिर्फ धूल फांकने के लिए हैं, तो ऐसी कागजी व्यवस्थाओं का क्या औचित्य रह जाता है?

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