रायगढ़ चौहान समाज: नेतृत्वविहीनता, विघटन और चेतना की दस्तक!

छत्तीसगढ़


✒ रायगढ़ चौहान समाज: नेतृत्वविहीनता, विघटन और चेतना की दस्तक!
– क्या समाज फिर उठ खड़ा होगा या यह एक और सामूहिक मौन में बदल जाएगा?

📍 रायगढ़ / छत्तीसगढ़
✍ रिपोर्ट: विशेष संवाददाता

Edited By : गणपत चौहान 
टेलीग्राफ टाइम्स
जुलाई 09,2025


नेतृत्व शून्यता में उलझा चौहान समाज: चेतना का क्षरण या नवचेतना की दस्तक?

एक समय छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला में सामाजिक एकता, अनुशासित संगठन और नेतृत्व क्षमता के लिए चर्चित चौहान समाज, आज 8 जून 2025 के बाद नेतृत्वविहीनता और आंतरिक विघटन की स्थिति में पहुंच चुका है। समाज में समानांतर घटक संगठन बनते जा रहे हैं, परस्पर संवाद की जगह सामूहिक मौन ने ले ली है, जिससे समाज की दिशा और दशा दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं।


8 जून को ‘एकीकरण’, या नेतृत्वविहीनता की शुरुआत?

रायगढ़ के एक रिसॉर्ट में 8 जून को समाज के प्रमुख घटकों द्वारा आयोजित एक बैठक में सामूहिक इस्तीफे देकर अपने पद ‘शून्य’ घोषित करने की घोषणा ने पूरे जिले को हिला दिया। यह कदम ‘एकीकरण’ के नाम पर उठाया गया था, परंतु इसके बाद समाज ठहर गया। लंबे समय से सक्रिय रहे समाजसेवी हाशिए पर चले गए, और पूर्व पदाधिकारी सोशल मीडियासार्वजनिक गतिविधियों से दूर हो गए।

कभी प्रदेश स्तरीय नेतृत्व देने वाला यह समाज आज संकटग्रस्त और दिशाहीन दिखता है, जबकि अन्य जिलों में चौहान समाज अब भी गतिशील है।

Photo credit Telegraph Times

रानी चौहान: संघर्ष की नायिका

ऐसे समय में रानी चौहान ने एक सशक्त महिला नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाई। मरीन ड्राइव कांड में जब चौहान समाज सहित अन्य समुदायों के दर्जनों गरीब परिवारों के घरों पर तोड़फोड़ की गई, तब उन्होंने खुलकर विरोध किया और बलपूर्वक गिरफ्तारी के बावजूद अपनी मुखरता को कायम रखा।

यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि उस समय समाज का कोई संगठित प्रतिनिधि उनके साथ खड़ा नहीं हुआ — न प्रत्यक्ष, न समर्थन स्वरूप।


अभय समिति: कानूनी हस्तक्षेप से सामाजिक चेतना का प्रयास

अठगवां अभय समिति ने सराईटोला विवाद में सोशल मीडिया पर घसिया-गाड़ा शब्दों के आपत्तिजनक उपयोग को लेकर पुलिस और जिला प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग कर नेतृत्व के खालीपन को भरने का प्रयास किया है। यह एक नवचेतना का संकेत है जो अन्य निष्क्रिय संगठनों के लिए प्रेरणा बन सकता है।


घोषणाएं अधूरी, उम्मीदें अधूरी

7 अप्रैल 2025 को रायगढ़ नगर निगम ऑडिटोरियम में आयोजित चौहान समाज के सम्मान समारोह में वित्त मंत्री ओपी चौधरी द्वारा मंच से 50 गरीब स्कूली बच्चों को ₹5000 की सहायता राशि देने की घोषणा की गई थी। परंतु तीन माह बीत जाने के बावजूद यह योजना कागज़ों में दबी रह गई
अब अभिभावक कर्ज लेकर बच्चों की पढ़ाई करवा रहे हैं — यह समाज के भीतर भरोसे की टूटन का संकेत है।


क्या नेतृत्व उभरेगा या रहेगा मौन?

अब समाज नए नेतृत्व या स्थायी निष्क्रियता — दो राहों पर खड़ा है। संकट स्पष्ट है, लेकिन इसका समाधान एक और सामूहिक मौन होगा या संगठित पुनरुत्थान — यह समय बताएगा।


विभिन्न घटक संगठनों के वर्जन:

🗣 रामेश्वर चौहान (लैलुंगा)
“एकीकरण हो चुका है, फिलहाल बारिश के कारण गतिविधियाँ मंद हैं, लेकिन सामाजिक जन सकारात्मक हैं।”

🗣 चेहरा लाल चौहान (पुसौर)
“हमने समाजहित में पद त्यागा था, परंतु अब एकीकरण आगे नहीं बढ़ रहा। वरिष्ठों को साथ लेकर आगे चलना जरूरी है।”

🗣 गुलाब चौहान (रायगढ़)
“एकीकरण की पूरी प्रक्रिया से मैं अनभिज्ञ हूं। मुझे इसकी जानकारी भी नहीं दी गई। मैं अभी भी आदर्श चौहान समाज का जिलाध्यक्ष हूं।”

🗣 महावीर गुरुजी (रायगढ़)
“मैंने भी अपने पद का त्याग किया, लेकिन समाजहित के लिए आजीवन कार्य करता रहूंगा।”

🗣 संतोष चौहान (सिंघनपुर)
“एकीकरण हो या ना हो, सामाजिक गतिविधियाँ हर स्तर पर साझा की जानी चाहिए। कोई ना कोई मसीहा अवश्य खड़ा होगा।”

🗣 विजयलक्ष्मी चौहान (जिला महिला अध्यक्ष)
“कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति होनी चाहिए थी, जिससे संगठनात्मक रिक्तता ना आती।”


क्या ओपी चौधरी उठाएंगे गाड़ा समाज को अनुसूचित जनजाति में बहाली का मुद्दा?

7 अप्रैल को सौंपे गए ज्ञापन में चौहान समाज ने विधायक व वित्त मंत्री ओपी चौधरी से गाड़ा जाति को आदिवासी वर्ग में बहाल करने की मांग की थी। उन्होंने उस दिन मंच से खुद को “चौधरी नहीं, चौहान” कहलाना पसंद किया था।

अब सवाल यह है कि क्या 14 से 18 जुलाई 2025 के विधानसभा मानसून सत्र में वे इस मुद्दे को उठाएंगे?


चलते-चलते: क्या नया नेतृत्व मिलेगा?

उक्त एकीकरण बैठक में रायगढ़ नगर निगम के महापौर जीवर्धन चौहान ने सुझाव दिया था कि समाज का प्रमुख न तो कोई सरकारी कर्मचारी हो, न ही किसी राजनीतिक दल का पदाधिकारी — इस सुझाव को समाज में सराहना मिल रही है।


🛑
रायगढ़ का चौहान समाज दोराहे पर है — विचारशील नेतृत्व और सक्रिय चेतना की सख्त ज़रूरत है। अगर सामूहिक मौन ही अंतिम परिणति बना, तो यह समाज अपने गौरवशाली अतीत से और दूर होता चला जाएगा।


 

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