रातल्या गांव के युवाओं ने संवारी मोक्षधाम की सूरत: 13 वर्षों की तपस्या से ‘मरुस्थल’ को बना दिया नंदनवन

योगेश शर्मा 

जयपुर। सामान्यतः लोग सुबह स्नान करने के बाद देवालयों का रुख करते हैं या अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं, लेकिन जयपुर की जगन्नाथपुरा ग्राम पंचायत के रातल्या गांव के युवाओं की टोली ने एक अलग ही राह चुनी है। इन युवाओं ने श्मशान घाट (मोक्षधाम) को ही अपनी सेवा का केंद्र बना लिया है और पिछले 13 वर्षों से हरियाली की एक ऐसी ‘इबादत’ लिख रहे हैं, जिसकी मिसाल पूरे क्षेत्र में दी जा रही है।

एक व्यक्तिगत पीड़ा से जन्मा संकल्प

​आज से 13 वर्ष पूर्व, दिनेश बागड़ा, कृष्ण बागड़ा और राजू बागड़ा अपने परिवार के एक सदस्य के दाह संस्कार में शामिल होने मोक्षधाम पहुंचे थे। उस समय भीषण गर्मी के बीच वहां बैठने के लिए छाया का नामोनिशान नहीं था। शोक संतप्त लोगों को धूप में परेशान होते देख इन युवाओं के मन में एक टीस उठी। उसी दिन इन्होंने संकल्प लिया कि वे इस श्मशान भूमि का कायाकल्प करेंगे और यहाँ छायादार वृक्षों का जाल बिछाएंगे।

सुबह का ‘मंदिर’ है मोक्षधाम

​इन युवाओं की दिनचर्या किसी आध्यात्मिक साधना से कम नहीं है। रोज सुबह स्नान के बाद ये युवा मंदिर जाने के बजाय सीधे मोक्षधाम पहुंचते हैं। 13 साल पहले शुरू हुआ यह सफर आज 200 से ज्यादा लहलहाते पेड़ों के रूप में दिखाई देता है। इन्होंने यहाँ नीम, पीपल, बरगद और अरडू जैसे विशालकाय और छायादार वृक्ष लगाकर श्मशान को एक रमणीय स्थल में बदल दिया है।

बाल्टियों से पानी ढोकर सींचा हर पौधा

​इस मिशन की राह इतनी आसान नहीं थी। पथरीली जमीन और पानी की कमी सबसे बड़ी बाधा थी। युवाओं ने हार मानने के बजाय ग्रामीणों के सहयोग से चंदा एकत्रित किया और मोक्षधाम में बने होद (टैंक) में पानी का टैंकर डलवाना शुरू किया।

  • अथक प्रयास: ये युवा प्रतिदिन अपने हाथों से बाल्टियां ढोकर पौधों को पानी पिलाते हैं।
  • विस्तार: केवल मोक्षधाम ही नहीं, बल्कि गांव की हर सार्वजनिक जगह और संस्था में भी इन्होंने पौधारोपण कर उसे सुरक्षित किया है।

मिशन अभी अधूरा है…

​युवाओं का कहना है कि उनका मिशन तब तक जारी रहेगा जब तक पूरे मोक्षधाम परिसर में चप्पे-चप्पे पर हरियाली न छा जाए। आज रातल्या गांव का यह मोक्षधाम उन लोगों के लिए एक मिसाल है जो समाज सेवा के लिए केवल संसाधनों का इंतजार करते हैं। इन युवाओं ने साबित कर दिया कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो श्मशान जैसी शांत जगह को भी जीवनदायिनी ऑक्सीजन और छाया का केंद्र बनाया जा सकता है।

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