रातल्या के युवाओं की अनूठी पहल: कचरे से बनाया पक्षियों का ‘कूलर’ जैसा बसेरा, नारियल के खोल बचाएंगे बेजुबानों की जान

रिपोर्ट योगेश शर्मा 

जयपुर। जब पारा 50 डिग्री सेल्सियस को छूने लगता है, तब इंसान तो एसी और कूलर में राहत पा लेता है, लेकिन बेजुबान पक्षी तपती धूप और लू के थपेड़ों से दम तोड़ने लगते हैं। इस भीषण संकट के बीच डिग्गी मालपुरा रोड स्थित रातल्या गांव के युवाओं ने एक ऐसी इको-फ्रेंडली पहल की है, जो न केवल पक्षियों को सुरक्षित ठिकाना दे रही है, बल्कि कचरा प्रबंधन का भी बेहतरीन उदाहरण पेश कर रही है।

कचरा बना बेजुबानों का आशियाना

​पर्यावरण प्रेमी दिनेश रातल्या और राजुलाल चेला अचरावाला ने बेकार पड़े नारियल के खोल (कोकोनट शैल्स) से पक्षियों के लिए ‘नेचुरल कूलर’ जैसे घोंसले तैयार किए हैं। ये युवा सड़क किनारे और ठेलों पर फेंके गए नारियल इकट्ठा करते हैं और उन्हें बड़ी बारीकी से तराश कर, छेद निकालकर और रस्सी पिरोकर पेड़ों पर टांगने योग्य बनाते हैं।

प्लास्टिक से बेहतर और ठंडे हैं ये घोंसले

​इन नारियल के घोंसलों की खासियत यह है कि ये प्लास्टिक या लोहे के बर्तनों की तुलना में बेहद ठंडे रहते हैं।

  • तापमान नियंत्रण: भीषण गर्मी में भी इनका आंतरिक हिस्सा ठंडा रहता है, जो विशेषकर गौरैया जैसे छोटे पक्षियों को लू से बचाता है।
  • मजबूती: नारियल का सख्त आवरण (हस्क) इसे टिकाऊ बनाता है, जिससे तेज आंधी और तूफान में भी पक्षियों का घर सुरक्षित रहता है।

अभियान का लक्ष्य: 2100 घोंसलों का वितरण

​समाजसेवी दिनेश बागड़ा ने बताया कि उनकी टीम हर रात 100 से अधिक घोंसले तैयार कर रही है। इस मुहिम का लक्ष्य आसपास के गांवों में 2100 घोंसले निःशुल्क वितरित करना है। युवा टोली घर-घर जाकर लोगों को ये घोंसले दे रही है ताकि हर आंगन में पक्षियों की चहचहाहट बनी रहे। इसके साथ ही, गांवों के सूखे जलाशयों को टैंकरों के माध्यम से भरने का भी संकल्प लिया गया है ताकि बेजुबान अपनी प्यास बुझा सकें।

मंदिर परिसर में पौधारोपण और परिंडा वितरण

​रविवार को इस मुहिम के तहत रातल्या गांव स्थित गुरु महाराज मंदिर परिसर में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। यहाँ पक्षियों के लिए परिंडे लगाए गए, नारियल के घोंसले टांगे गए और छायादार गुलर के 11 पौधे लगाए गए।

​इस अवसर पर लालचन्द शर्मा, शुभम लोदवाल, नीरज मेहता, रघुनाथ धनवंता सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं और युवा उपस्थित रहे।

प्रेरणा: रातल्या के इन युवाओं ने साबित कर दिया है कि दुनिया को बचाने के लिए किसी बड़े चमत्कार की नहीं, बल्कि संसाधनों के सही उपयोग और एक नेक सोच की जरूरत होती है।

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