राजस्थान में भी सरकारी कर्मचारियों को विपश्यना के लिए मिले 14 दिन का अवकाश: आचार्य पाटोदिया ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
| योगेश शर्मा
जयपुर। राजस्थान के सरकारी तंत्र में कार्यकुशलता बढ़ाने और तनाव मुक्त कार्य वातावरण सुनिश्चित करने के लिए महाराष्ट्र की तर्ज पर विशेष अवकाश देने की मांग उठी है। आध्यात्मिक चिंतक और राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित नैतिक शिक्षाविद आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर प्रदेश के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को विपश्यना साधना के लिए 14 दिन का सवैतनिक अवकाश (Paid Leave) प्रदान करने का सुझाव दिया है।
महाराष्ट्र मॉडल का दिया हवाला
आचार्य पाटोदिया ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि महाराष्ट्र सरकार वर्ष 2003 से अपने कर्मचारियों को विपश्यना शिविर में भाग लेने पर 14 दिन का सवैतनिक अवकाश प्रदान कर रही है। उन्होंने कहा कि इस पहल के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं:
- कार्यक्षमता में वृद्धि: साधना के बाद कर्मचारियों की निर्णय लेने की क्षमता और एकाग्रता बढ़ी है।
- व्यवहार में परिवर्तन: सरकारी कार्यालयों में जनता के साथ कर्मचारियों के व्यवहार में अधिक संवेदनशीलता और विनम्रता देखी गई है।
- मानसिक स्वास्थ्य: तनावपूर्ण ड्यूटी के बीच मानसिक शांति प्राप्त करने का यह एक सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ है।
स्वयं के संस्थानों में की ‘पेड हॉलिडे’ की घोषणा
आचार्य पाटोदिया ने इस नेक कार्य की शुरुआत अपने स्तर पर भी कर दी है। उन्होंने घोषणा की है कि मीरा हॉस्पिटल और मीरा डेंटल हॉस्पिटल के जो भी डॉक्टर या स्टाफ सदस्य विपश्यना शिविर में भाग लेंगे, उन्हें संस्थान की ओर से पेड हॉलिडे (सवैतनिक अवकाश) दिया जाएगा।
अनुभव से उपजी समाज सेवा की प्रेरणा
आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया स्वयं वर्ष 1990 से निरंतर विपश्यना साधना से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि इस प्राचीन ध्यान विधि से उन्हें व्यक्तिगत जीवन में असीम लाभ हुआ है। इसी अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने समाज सेवा और प्रशासनिक सुधार के लिए इस मांग को मुख्यमंत्री के समक्ष रखा है।
”विपश्यना केवल एक ध्यान विधि नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यदि प्रदेश के लोकसेवक मानसिक रूप से संतुलित और शांत रहेंगे, तो ‘सुशासन’ का संकल्प स्वतः ही सिद्ध हो जाएगा।”
— आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया
क्या है विपश्यना साधना?
विपश्यना भारत की अत्यंत प्राचीन ध्यान विधियों में से एक है, जिसे महात्मा बुद्ध ने पुनर्जीवित किया था। यह बिना किसी धार्मिक भेदभाव के आत्म-निरीक्षण द्वारा आत्म-शुद्धि की एक प्रक्रिया है। आमतौर पर इसका आधारभूत शिविर 10 दिनों का होता है।
