राजस्थान में आवारा कुत्तों का संकट: हाईकोर्ट ने सरकार और निगमों से मांगा जवाब, कहा – “कल्याण भी हो, सुरक्षा भी”

राजस्थान में आवारा कुत्तों का संकट: हाईकोर्ट ने सरकार और निगमों से मांगा जवाब, कहा – “कल्याण भी हो, सुरक्षा भी”

Edited By : नरेश गुनानी
टेलीग्राफ टाइम्स
जुलाई 01,2025

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सड़कों पर लगातार बढ़ती आवारा कुत्तों की संख्या और उनसे राहगीरों पर हो रहे हमलों को लेकर गहरी चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश एम. एम. श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति मनीष शर्मा की खंडपीठ ने इस गंभीर मुद्दे पर स्वप्रेरित प्रसंज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेते हुए राज्य सरकार, स्वायत्त शासन विभाग, जयपुर हेरिटेज और ग्रेटर नगर निगम से विस्तृत जवाब तलब किया है।

स्टेरलाइजेशन से नहीं रुक रही घटनाएं, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने स्पष्ट किया कि महज स्टेरलाइजेशन (नसबंदी) जैसी प्रक्रिया से आवारा कुत्तों की हिंसक घटनाओं में कोई खास कमी नहीं आई है। सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा,

“हम यह चाहते हैं कि कुत्तों का कल्याण भी हो और आम नागरिकों को सुरक्षित रास्ता भी मिले।”

हर दिन किसी न किसी नागरिक पर हमला – कोर्ट में न्यायमित्र की दलील

कोर्ट में नियुक्त न्यायमित्र प्रतीक कासलीवाल ने बताया कि जयपुर जैसे शहर में हर दिन किसी न किसी व्यक्ति पर आवारा कुत्तों का हमला होता है। उन्होंने कहा कि अब जयपुर ऐसे हमलों की राजधानी बन चुका है।

कासलीवाल ने अदालत को यह भी याद दिलाया कि वर्ष 1997 में हाईकोर्ट ने ही सड़कों को आवारा पशुओं से मुक्त करने के निर्देश दिए थे, लेकिन 27 साल बाद भी उनका पालन नहीं हुआ।

पिछले साल हाईकोर्ट ने लिया था स्वत: संज्ञान

गौरतलब है कि 25 सितंबर 2024 को राजस्थान हाईकोर्ट ने पहली बार इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिया था। उस वक्त अदालत ने स्पष्ट किया था कि केरल जैसे राज्य ने इस समस्या से निपटने के लिए विशेष कानून बनाए हैं। ऐसे में राजस्थान सरकार को भी ठोस और कारगर रणनीति अपनानी चाहिए।

बच्चे और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित

कोर्ट ने यह भी कहा कि सड़कों पर चलते छोटे बच्चे, बुजुर्ग और राहगीर सबसे ज्यादा इन कुत्तों के हमलों के शिकार हो रहे हैं।

“अगर स्कूल, कॉलोनी और सार्वजनिक स्थलों के पास ही कुत्ते खुले घूमते हैं, तो आम नागरिक की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?” — कोर्ट

सरकार को देना होगा विस्तृत जवाब

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार, स्वायत्त शासन विभाग और नगर निगमों को निर्देश दिए हैं कि वे अदालत को यह बताएं:

  • अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं?
  • कुत्तों की नसबंदी और पुनर्वास के लिए कितने केंद्र हैं?
  • आवारा कुत्तों को सुरक्षित रूप से रखने की क्या व्यवस्था है?
  • और अब तक की कार्यवाही का क्या असर हुआ है?

जनहित और नीति निर्माण के मोड़ पर मामला

यह मामला अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां पशु कल्याण और नागरिक सुरक्षा – दोनों को संतुलित करना जरूरी हो गया है। कोर्ट का यह रुख न केवल नगर प्रशासन को जिम्मेदार ठहराता है, बल्कि एक ठोस नीति और संवेदनशील दृष्टिकोण की भी मांग करता है।


 

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