ब्यूरो रिपोर्ट (हरिप्रसाद शर्मा), पुष्कर/अजमेर।
जयपुर। राजस्थान में पंचायत समितियों, जिला परिषदों और नगरीय निकायों के चुनावों को लेकर बड़ी खबर आ रही है। राज्य सरकार के बाद अब राज्य निर्वाचन आयोग ने भी चुनाव फिलहाल टालने के लिए राजस्थान हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र पेश कर दिया है। हाईकोर्ट इस मामले पर आगामी 11 मई को सुनवाई करेगा।
सरकार का पक्ष: ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ की ओर कदम
हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में तुरंत चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं है। सरकार ने इसके पीछे कई महत्वपूर्ण तर्क दिए हैं:
- कार्यकाल की एकरूपता: सरकार का कहना है कि अक्टूबर से दिसंबर के बीच कई और पंचायत समितियों तथा जिला परिषदों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। यदि इन सबका चुनाव एक साथ कराया जाए, तो इससे ‘वन स्टेट वन इलेक्शन’ की धारणा को मजबूती मिलेगी।
- संसाधनों की कमी: राज्य सरकार ने ईवीएम (EVM), पर्याप्त पुलिस बल और शैक्षणिक स्टाफ की उपलब्धता न होने का हवाला दिया है।
- ओबीसी आयोग की रिपोर्ट: ओबीसी आरक्षण से जुड़ी रिपोर्ट और डेटा प्रक्रियाधीन होने के कारण भी चुनाव की तैयारियों में बाधा आ रही है।
निर्वाचन आयोग ने भी किया सरकार का समर्थन
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब राज्य निर्वाचन आयोग ने भी हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र पेश कर चुनाव टालने की सरकार की मांग का समर्थन किया। आयोग का कहना है कि 15 अप्रैल तक चुनाव कराने के कोर्ट के आदेश की पालना की हरसंभव कोशिश की गई, लेकिन संसाधनों और तकनीकी बाधाओं के चलते यह संभव नहीं हो सका।
दिसंबर तक समय मांगने की तैयारी
सरकार की ओर से पेश प्रार्थना पत्र में दिसंबर तक का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। इसमें हर महीने की प्रशासनिक और चुनावी स्थितियों का हवाला देते हुए वर्ष के अंत तक चुनाव प्रक्रिया को आगे खिसकाने का अनुरोध किया गया है।
मुख्य बिंदु:
- 11 मई: राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई की अगली तारीख।
- मुख्य मांग: पंचायत और निकाय चुनाव को दिसंबर 2026 तक टालने का अनुरोध।
- कारण: ईवीएम की कमी, स्टाफ की ड्यूटी, और ओबीसी आरक्षण का ‘ट्रिपल टेस्ट’ पूरा करना।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
विपक्ष ने सरकार के इस कदम पर सवाल उठाए हैं, वहीं सरकार का तर्क है कि वह चुनाव प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाना चाहती है। अब सबकी नजरें 11 मई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ यह तय होगा कि राजस्थान में लोकतंत्र के इस छोटे उत्सव के लिए जनता को और कितना इंतजार करना होगा।