नेहा रंजन
नई दिल्ली: देश की राजधानी में आयोजित ‘पूर्वांचल महोत्सव – माटी’ अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपनी विरासत पर गर्व करने का एक बड़ा केंद्र बन गया है। इस भव्य कार्यक्रम में पूर्वांचल की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता, लोक कला और सामूहिक स्मृति का जीवंत प्रदर्शन देखा गया। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि सफलता की किसी भी ऊंचाई पर पहुँचने के बाद भी अपनी ‘माटी’ से जुड़े रहना ही मनुष्य के संस्कारों को जीवित रखता है।

जड़ों से जुड़ाव: संस्कार और संस्कृति की नींव
महोत्सव में इस विचार को प्रमुखता से साझा किया गया कि व्यक्ति जीवन में चाहे कितनी भी बड़ी उपलब्धि हासिल कर ले, उसे अपनी मिट्टी, परंपराओं और विरासत को कभी नहीं भूलना चाहिए। माटी से जुड़ाव ही वह सूत्र है जो व्यक्ति को उसके संस्कारों से बांधे रखता है और उसे अपनी संस्कृति को समृद्ध करने की प्रेरणा देता है।
वैश्विक मंच पर पूर्वांचल का गौरव
पूर्वांचल के लोगों ने अपनी मेहनत और मेधा से न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। महोत्सव में चर्चा के दौरान निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित किया गया:
- बहुआयामी प्रतिभा: गाँव की गलियों से लेकर वैश्विक मंचों और संसद तक, पूर्वांचल की प्रतिभा का लोहा माना जा रहा है।
- परिश्रम और प्रतिबद्धता: यहाँ के लोगों का कठिन परिश्रम और अपने लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही उन्हें हर क्षेत्र में अग्रणी बनाती है।
- सांस्कृतिक आत्मा: पूर्वांचल का लोक जीवन भारत की सांस्कृतिक आत्मा की सहज अभिव्यक्ति है। यहाँ के लोकगीत, नृत्य और साहित्य भारतीय परंपरा के अभिन्न अंग हैं।
कला और साहित्य का संगम
इस महोत्सव का मुख्य आकर्षण वह निष्ठा और आत्मीयता रही, जिसके साथ पूर्वांचल के साहित्य, लोक कला और पारंपरिक व्यंजनों को मंच प्रदान किया गया। महोत्सव ने प्रवासी पूर्वांचलियों के बीच एक ‘सामूहिक स्मृति’ को ताजा करने का काम किया, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी अपनी जड़ों को पहचान सकें।
