रत्ना के ‘तुलसी’, प्रभु राम के ‘दास’: जन-जन के अमर कवि गोस्वामी तुलसीदास

सुनील शर्मा 

रामचरितमानस के माध्यम से समूची मानव जाति को प्रभु श्रीराम के आदर्शों से जोड़ने वाले और श्रीराम को जन-जन के हृदय में प्रतिष्ठित करने वाले गोस्वामी तुलसीदास भारतीय भक्ति काव्य के अद्वितीय नक्षत्र हैं। उन्होंने न केवल धर्म और दर्शन को आम जनमानस की भाषा दी, बल्कि समाज को नैतिकता, मर्यादा और लोक-कल्याण का एक ऐसा शाश्वत मार्ग दिखाया जो सदियों बाद भी प्रासंगिक है।

​‘गोस्वामी’ नाम का गूढ़ अर्थ

​तुलसीदास के नाम के आगे ‘गोस्वामी’ शब्द केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि उनकी आत्मिक अवस्था का परिचायक है। संस्कृत में ‘गो’ का अर्थ इंद्रियां और ‘स्वामी’ का अर्थ मालिक या विजेता होता है। अर्थात, जिसने अपनी समस्त इंद्रियों और वासनाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली हो, वही सच्चा ‘गोस्वामी’ है। सांसारिक आसक्तियों को त्यागकर ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण का भाव ही उन्हें इस गरिमापूर्ण संबोधन का सच्चा अधिकारी बनाता है।

​अनुराग से वैराग्य: जीवन को बदलने वाला वह एक मोड़

​तुलसीदास का प्रारंभिक जीवन भौतिक प्रेम से परिपूर्ण था। वे अपनी पत्नी रत्नावली के रूप-सौंदर्य और स्नेह पर अत्यंत मुग्ध थे।

    • तूफानी रात और यमुना पार: एक बार जब रत्नावली अपने मायके गई हुई थीं, तो विरह की व्याकुलता में तुलसीदास रात के घोर अंधकार और मूसलाधार बारिश में उफनती यमुना नदी को पार कर ससुराल पहुंच गए।
    • रत्नावली की वह सीख: पत्नी के कक्ष में पहुंचने पर रत्नावली ने आश्चर्य और क्षोभ के साथ उन्हें झकझोरते हुए कहा: ​“लाज न आई आपको, दौरे आयहु साथ। धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥ अस्थि चर्म मय देह यह, तासों ऐसी प्रीति। नेकु जो होती राम महं, तो न भवभीति॥”

“लाज न आई आपको, दौरे आयहु साथ। धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥

अस्थि चर्म मय देह यह, तासों ऐसी प्रीति। नेकु जो होती राम महं, तो न भवभीति॥”

 

      • चेतना का जागरण: हाड़-मांस के नश्वर शरीर की जगह अविनाशी प्रभु राम से प्रेम करने की यह सीख तुलसीदास के हृदय में तीर की तरह चुभ गई। उसी क्षण मोह के सारे बंधन टूट गए और सांसारिक अनुराग, अनन्य राम-वैराग्य में परिवर्तित हो गया।

​गुरु नरहरिदास का सान्निध्य और साधना

​वैराग्य के बाद जब तुलसीदास राजापुर लौटे, तब उनकी भेंट स्वामी नरहरिदास से हुई। गुरु नरहरिदास ने उनकी अंतर्मुखी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें विधिवत दीक्षा दी और राम-भक्ति का मार्ग दिखाया।

​गुरु के सान्निध्य में तुलसीदास ने वेद, उपनिषद, पुराण और दर्शन का गहन अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने रामकथा को केवल मोक्ष का साधन नहीं, बल्कि एक सुखद, समतामूलक और आदर्श समाज के निर्माण का सशक्त माध्यम बना लिया।

​संस्कृत से अवधी: लोकभाषा में रामकथा का प्रवाह

​महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में आदि काव्य ‘रामायण’ की रचना कर श्रीराम के जीवन और आदर्शों को साहित्य के अमर पटल पर स्थापित किया था। किंतु, संस्कृत विद्वानों और राजप्रासादों तक सीमित थी।

      • ​तुलसीदास ने इस ज्ञान-गंगा को जनसाधारण तक पहुंचाने का युगांतकारी निर्णय लिया।
      • ​उन्होंने तत्कालीन लोकभाषा अवधी में ‘रामचरितमानस’ का सृजन किया।
      • ​उन्होंने रामकथा को शास्त्रीय बंधनों से मुक्त कर आम किसान, मजदूर और गृहस्थ के घर-आंगन तक पहुंचा दिया।

​लोक मंगल और संस्कारों के प्राण तत्व: तुलसी के राम

​रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों और जीवन मूल्यों की आचार संहिता है।

      • पारिवारिक मर्यादा: पुत्र का पिता के प्रति, भाई का भाई के प्रति और पति-पत्नी के परस्पर धर्म का जैसा सजीव चित्रण मानस में है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
      • लोक मंगल की भावना: तुलसी के राम महलों के ऐश्वर्य से निकलकर वनवासियों, निषादराज और शबरी जैसे उपेक्षित जनों को गले लगाते हैं।
      • समन्वय के अग्रदूत: उन्होंने ज्ञान और भक्ति, शैव और वैष्णव, तथा राजा और प्रजा के बीच समन्वय स्थापित कर भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में पिरोया।

​तुलसीदास जी ने अपनी लेखनी से जो सामाजिक समरसता और मर्यादा का आदर्श स्थापित किया, उसी के कारण वे कालजयी बनकर आज भी जन-जन के कंठहार और भारतीय जनमानस के सच्चे मार्गदर्शक बने हुए हैं।

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