यूनेस्को भारत कार्यालय में प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘Humans in the Loop’, एआई और सामाजिक प्रभावों पर उठाए सवाल
नई दिल्ली। प्रीति बालानी। टेलीग्राफ टाइम्स।
किरण राव और बिजु टोप्पो द्वारा निर्मित तथा अरन्या सहाय निर्देशित फ़िल्म ‘Humans in the Loop’ का एक विशेष शो हाल ही में भारत के यूनेस्को कार्यालय में आयोजित किया गया। यह फ़िल्म झारखंड की एक आदिवासी महिला की कहानी पर आधारित है, जो अचानक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के सम्पर्क में आती है और इस प्रक्रिया में तकनीक में छिपे पूर्वाग्रहों तथा उससे जुड़ी नैतिक दुविधाओं को उजागर करती है।
फ़िल्म न केवल एआई के कार्यप्रणाली पर रोशनी डालती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि तकनीकी विकास का असर किस तरह हाशिए पर खड़े समुदायों तक पहुंचता है। इसमें यह संदेश प्रमुखता से रखा गया कि तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो, यदि उसमें सामाजिक संवेदनशीलता और नैतिक संतुलन नहीं है तो उसका प्रभाव असमानता को और गहरा कर सकता है।
‘Humans in the Loop’ दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि नई तकनीकों का समाज पर वास्तविक असर क्या है और किस प्रकार आदिवासी या ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग अनजाने में इस तकनीकी क्रांति का हिस्सा बन जाते हैं। फ़िल्म यह प्रश्न उठाती है कि क्या एआई केवल सुविधा और प्रगति का प्रतीक है, या इसमें छिपे पूर्वाग्रह और पक्षपात सामाजिक न्याय की राह में नई चुनौतियां पेश करते हैं।
विशेष शो के दौरान उपस्थित विशेषज्ञों और दर्शकों ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि यह फ़िल्म भविष्य की उन संभावनाओं और खतरों पर प्रकाश डालती है जिन्हें तकनीकी नवाचार के साथ-साथ नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यूनेस्को के अधिकारियों ने भी इस बात पर बल दिया कि एआई और उभरती तकनीकों का विकास केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी संतुलित होना चाहिए।
यह फ़िल्म एक कलात्मक प्रयोग होने के साथ-साथ सामाजिक विमर्श का माध्यम भी है, जो तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।