मूल रचना से अधिक समृद्ध हो वही अनुवाद सफल: डॉ. राजेश व्यास

मूल रचना से अधिक समृद्ध हो वही अनुवाद सफल: डॉ. राजेश व्यास

​राजस्थानी अनुवाद एवं काव्य सृजन कार्यशाला का भव्य समापन; प्रदेशभर के 40 साहित्यकार हुए शामिल

| योगेश शर्मा

​जयपुर। “अनुवाद केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं है, बल्कि यह एक कला है। वही अनुवाद सफल माना जाता है जो पाठक को मूल रचना तक पहुँचने और उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करे। सफल अनुवादक के लिए शब्द की भंगिमा, उसकी शक्ति, अर्थ की पृष्ठभूमि और संस्कृति से परिचित होना अनिवार्य है।” ये विचार जनसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. राजेश कुमार व्यास ने व्यक्त किए।

​वे झालाना संस्थानिक क्षेत्र स्थित राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के सभागार में आयोजित दो दिवसीय राजस्थानी अनुवाद एवं काव्य सृजन कार्यशाला के समापन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

​अनुवाद: एक चुनौतीपूर्ण साधना

​डॉ. व्यास ने कहा कि राजस्थानी भाषा में अनुवाद करना साहित्यकारों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अनुवाद मूल रचना के सृजन से भी अधिक कठिन कार्य है क्योंकि इसके लिए अनुवादक को दोनों भाषाओं की संस्कृति, मान्यताओं, भाव-भूमि और परंपराओं की गहरी समझ होनी चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा:

  • ​तुलसीदास का उदाहरण: गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में लोक भाषाओं का जो सफल प्रयोग किया, वह अनुवाद और रूपांतरण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
  • ​निराला की शक्ति पूजा: निराला ने ‘कृतिवास रामायण’ से प्रसंग लेकर ‘शक्ति पूजा’ की रचना की, जो आज कालजयी कृति है।

​राजस्थानी की समृद्धि और कश्मीर का गौरव

​राजस्थानी भाषा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. व्यास ने कहा कि जिस भाषा में जितनी अधिक बोलियां होती हैं, वह उतनी ही समृद्ध मानी जाती है। यदि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता मिलती है, तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों और साहित्य से अधिक प्रभावी ढंग से जुड़ सकेगी। उन्होंने कल्हण की राजतरंगिणी और शारदा पीठ का उल्लेख करते हुए बताया कि कश्मीर का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है और शारदा पीठ कभी नालंदा व तक्षशिला से भी बड़ा शिक्षा केंद्र हुआ करता था।

​कार्यशाला का उद्देश्य और भावी योजनाएं

​ग्रासरूट मीडिया के प्रमोद शर्मा ने बताया कि इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य राजस्थानी में सृजन क्षमता को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने घोषणा की कि ऐसी कार्यशालाएं भविष्य में जयपुर के साथ-साथ अन्य शहरों में भी आयोजित की जाएंगी। राजस्थान प्रौढ़ शिक्षा समिति के अध्यक्ष राजेंद्र बोडा ने सभी अतिथियों और संभागियों का आभार व्यक्त किया।

​साहित्यिक मंथन और सहभागिता

​कार्यशाला के अंतिम दिन कहानियों और कविताओं के अनुवाद पर गहन चर्चा हुई और उन्हें परिष्कृत किया गया। समापन अवसर पर हरिमोहन सारस्वत और राजूराम बिजारणियां ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

​प्रमुख प्रतिभागी: इस दो दिवसीय आयोजन में राजस्थान के विभिन्न कोनों से लगभग 40 प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने शिरकत की, जिनमें:

  • ​बीकानेर से मोनिका गौड़ व देवीलाल महिया
  • ​उदयपुर से बनवारी लाल पुरोहित
  • ​जोधपुर से बसंती पवार
  • ​श्रीगंगानगर से कृष्ण कुमार आशु
  • ​कोटा से जितेंद्र निर्मोही व किशन प्रणय
  • ​टोंक से महबूब अली प्रमुख थे।

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