लक्षणों को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी; फोर्टिस हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक्स विशेषज्ञ ने दूर की आर्थराइटिस से जुड़ी बड़ी गलतफहमियां
योगेश शर्मा
जयपुर। आर्थराइटिस (गठिया) को अक्सर केवल बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्या माना जाता है, लेकिन यह धारणा पूरी तरह भ्रामक और खतरनाक साबित हो सकती है। इसे केवल उम्र के नजरिए से देखने के कारण लोग इसके शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और समय पर डॉक्टर के पास नहीं जाते। वास्तव में, आर्थराइटिस जोड़ों से जुड़ी बीमारियों का एक व्यापक समूह है, जिसके कारण केवल उम्र तक सीमित नहीं हैं। यह बात फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर के ऑर्थोपेडिक्स एवं जॉइंट रिप्लेसमेंट कंसलटेंट डॉ. पीयूष अग्रवाल ने कही।
डॉ. पीयूष अग्रवाल ने आर्थराइटिस से जुड़े प्रमुख मिथकों (Myths) की सच्चाई बताते हुए आमजन को जागरूक रहने की अपील की है।
मिथक 1: आर्थराइटिस केवल बुजुर्गों को होता है
तथ्य: डॉ. अग्रवाल के अनुसार, यह सोचना गलत है कि यह बीमारी सिर्फ वृद्धों को प्रभावित करती है। हालांकि, ‘ऑस्टियोआर्थराइटिस’ उम्र के साथ जोड़ों में होने वाले घिसाव से जुड़ा होता है, लेकिन इसके कई अन्य प्रकार पूरी तरह अलग कारणों से होते हैं।
- रूमेटॉइड आर्थराइटिस: यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जो युवावस्था या मध्य आयु में भी शुरू हो सकती है।
- जुवेनाइल आर्थराइटिस: यह बीमारी बच्चों तक को अपनी चपेट में ले लेती है।
- युवाओं में बढ़ता खतरा: आजकल खराब जीवनशैली, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, गलत पॉस्चर (बैठने की आदत), खेलकूद के दौरान लगी चोट या पुराने आघात के कारण युवाओं में भी जोड़ों की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
मिथक 2: जोड़ों के दर्द को सामान्य मानकर सहन करना चाहिए
तथ्य: खासकर युवाओं में जोड़ों के दर्द को सामान्य मान लेना निदान और उपचार में देरी का बड़ा कारण बनता है। लगातार दर्द, सुबह के समय जकड़न, सूजन या जोड़ों को हिलाने-डुलाने में परेशानी होना आर्थराइटिस के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। इन लक्षणों को नजरअंदाज करने से जोड़ों के अंदरूनी हिस्से को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। आर्थराइटिस के कुछ प्रकार इतने गंभीर होते हैं कि वे जोड़ों के साथ-साथ शरीर के अन्य हिस्सों जैसे— त्वचा, आंखों और आंतरिक अंगों को भी प्रभावित करते हैं।
मिथक 3: दर्द होने पर हर तरह की शारीरिक गतिविधि बंद कर देनी चाहिए
तथ्य: कई लोग मानते हैं कि दर्द होने पर जोड़ों को पूरी तरह आराम देना चाहिए, जबकि वास्तविकता इसके उलट है। सही प्रकार की शारीरिक गतिविधि आर्थराइटिस के प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हल्के व्यायाम, स्ट्रेचिंग और मांसपेशियों को मजबूत करने वाले अभ्यास से जोड़ों का लचीलापन बना रहता है और दर्द कम होता है। इसके विपरीत, लंबे समय तक निष्क्रिय रहने या बेड रेस्ट करने से जोड़ों की जकड़न और बढ़ जाती है तथा आसपास की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं।
मिथक 4: आर्थराइटिस का कोई इलाज नहीं है, इसे सिर्फ सहना ही विकल्प है
तथ्य: यह धारणा भी पूरी तरह निराधार है। भले ही आर्थराइटिस के कुछ प्रकारों को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसके बेहतरीन उपचार उपलब्ध हैं। सही समय पर दवाएं, फिजियोथेरेपी, जीवनशैली में सुधार, वजन पर नियंत्रण और उचित चिकित्सीय परामर्श से बीमारी के बढ़ने की गति को धीमा किया जा सकता है। इससे मरीज दर्द मुक्त होकर एक सामान्य और गुणवत्तापूर्ण जीवन जी सकता है।
डॉ. पीयूष अग्रवाल की सलाह: जागरूकता ही बचाव है
डॉ. अग्रवाल ने जोर देते हुए कहा कि आर्थराइटिस को उम्र का अनिवार्य परिणाम मानकर टाला नहीं जाना चाहिए। हर उम्र के व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह अपने जोड़ों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे। लक्षणों को शुरुआती दौर में ही पहचान कर विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना गतिशीलता, आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक स्वास्थ्य बनाए रखने की एकमात्र कुंजी है।