जयपुर /योगेश शर्मा/राजस्थान में मानसून की बेरुखी के चलते कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी संकट मंडराने लगा है। राजस्थान खाद्य पदार्थ व्यापार संघ के चेयरमैन बाबूलाल गुप्ता ने चेतावनी दी है कि यदि आगामी 5 दिनों के भीतर राज्य में अच्छी बारिश नहीं होती है, तो खरीफ की फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी और प्रदेश भीषण अकाल की चपेट में आ जाएगा।
यह चिंताजनक निष्कर्ष राजस्थान की 247 अनाज मंडियों के प्रतिनिधियों से दूरभाष पर हुए व्यापक संपर्क और जमीनी फीडबैक के बाद सामने आया है। व्यापार संघ ने राज्य और केंद्र सरकार से समय रहते 10 लाख टन गेहूं और मवेशियों के लिए चारे का प्रबंध करने की मांग की है।
करोड़ों टन उत्पादन ठप होने की कगार पर: फसलों का गणित
बारिश न होने के कारण प्रदेश की मुख्य खरीफ फसलों का उत्पादन शून्य की ओर बढ़ रहा है। मंडियों के आकलन के अनुसार, निम्नलिखित प्रमुख फसलों की पैदावार खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी है:
- अनाज व तिलहन: बाजरे की 40 लाख टन, सोयाबीन की 8 लाख टन, मक्का की 15 लाख टन, ज्वार की 8 लाख टन और तिल की 2 लाख टन पैदावार पर सीधा संकट है।
- दलहन: मूंग की 14 लाख टन, उड़द की 1 लाख टन और मोठ की 4 लाख टन पैदावार पूरी तरह प्रभावित हो रही है।
- मूंगफली: मूंगफली की पैदावार महज 30 प्रतिशत (करीब 6-7 लाख टन) ही संभावित है, जिसके लिए भी अगले 15 दिनों में बारिश होना अनिवार्य है।
- कपास: कम पानी की आवश्यकता वाली इस फसल की हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, खैरथल, विजयनगर और केकड़ी में 50 प्रतिशत (करीब 10 लाख गांठ) पैदावार की उम्मीद बची है।
बुवाई की जमीनी स्थिति: कहीं 15% तो कहीं 80%
प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में बुवाई के आंकड़ों में भारी असमानता और गिरावट देखी जा रही है:
- बारानी और मुख्य क्षेत्र: केकड़ी, विजयनगर, मदनगंज-किशनगढ़, नागौर, मेड़तासिटी, कुचामनसिटी, टोंक, निवाई, सवाईमाधोपुर, बीकानेर, श्रीगंगानगर, खैरथल, भरतपुर, दौसा और लालसोट के बारानी क्षेत्रों में बुवाई का स्तर केवल 15 से 50 प्रतिशत के बीच ही अटका हुआ है।
- नहरी व कुआं क्षेत्र: नहरी और जाव (कुएं आधारित) जमीन पर भी पैदावार की संभावना सिर्फ 15 प्रतिशत ही आंकी जा रही है।
- बेहतर क्षेत्र: हाड़ौती के कोटा क्षेत्र में 75 प्रतिशत और उदयपुर क्षेत्र में करीब 80 प्रतिशत मक्का की बुवाई का अनुमान है।
बीकानेर का पापड़-भुजिया उद्योग संकट में, हजारों बेरोजगार होने का खतरा
मोठ की 4 लाख टन पैदावार बीकानेर की आजीविका के प्रमुख साधन—प्रसिद्ध पापड़ और मंगोड़ी उद्योग का मुख्य कच्चा माल (रॉ मैटेरियल) है। यदि मोठ की पैदावार नहीं होती है, तो इस कुटीर उद्योग को बहुत बड़ा झटका लगेगा। व्यापार संघ के अनुसार, इस संकट से उद्योग ठप हो सकता है और इसमें कार्यरत हजारों श्रमिक बेरोजगार हो जाएंगे। सरकार को इस संभावित बेरोजगारी से निपटने के लिए अभी से नीति बनानी होगी।
सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां: गेहूं और पशु चारा
- 10 से 15 लाख टन गेहूं की अतिरिक्त मांग: बाड़मेर, जैसलमेर, शेखावाटी, चूरूवाटी और बीकानेरवाटी जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में बाजरा मुख्य भोजन है। बाजरे की पैदावार केवल 15 प्रतिशत रहने के अनुमान के कारण इन क्षेत्रों से गेहूं की जोरदार मांग उठेगी। सरकार को तुरंत बफर स्टॉक का प्रबंधन करना होगा।
- छह महीने के चारे का संकट: आमतौर पर बाजरे की कड़बी की कुट्टी बनाकर गाय, भैंस और नंदी जैसे पशुधन को खिलाई जाती है। इस बार चारा न होने से पशुओं के लिए अगले छह महीने का संकट खड़ा हो जाएगा। राज्य सरकार को अन्य प्रांतों से चारा मंगाने और केंद्र सरकार से विशेष बजट की मांग तुरंत करनी चाहिए।
गिरती जीडीपी और बेकाबू महंगाई की चेतावनी
”राजस्थान का किसान खरीफ और रबी, दोनों फसलों पर निर्भर है। खरीफ बर्बाद होने से रबी की फसल (चना, गेहूं, जौ, अरहर, सरसों) के लिए भी जमीन में नमी नहीं बचेगी, जिससे किसान की सालभर की कमाई शून्य हो जाएगी। कृषि प्रधान राज्य होने के नाते राजस्थान की जीडीपी (GDP) में भारी गिरावट आएगी। किसान की क्रय शक्ति घटने से कपड़ा, लोहा, सीमेंट, रियल एस्टेट और सोना-चांदी बाजार में बिक्री केवल 20 प्रतिशत तक सिमट जाएगी। इसके साथ ही कृषि जिंसों की कमी से आम जनता को भीषण महंगाई का दंश झेलना पड़ेगा।”
– बाबूलाल गुप्ता, चेयरमैन, राजस्थान खाद्य पदार्थ व्यापार संघ
व्यापार संघ ने पुरजोर मांग की है कि राज्य सरकार इस आने वाली अकाल की विभीषिका को प्राथमिकता पर लेते हुए केंद्र के साथ मिलकर राहत कार्यों और किसानों को आर्थिक सहारा देने की तत्काल तैयारी शुरू करे।