महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं को मिले अलग हिस्सेदारी, प्रधानमंत्री को भेजा ज्ञापन: राजेन्द्र सेन

रिपोर्ट योगेश शर्मा 

जयपुर। देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाए गए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ (106वां संविधान संशोधन) को लेकर चर्चाओं का दौर फिर से तेज हो गया है। लोकसभा में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया पर आयोजित होने वाली तीन दिवसीय चर्चा के बीच अब ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) समाज की ओर से भी इसमें आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग उठने लगी है।

सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की मांग

ओबीसी एडवाईजरी काउंसिल के सदस्य एवं एआईसीसी ओबीसी विभाग के पूर्व नेशनल कोर्डिनेटर राजेन्द्र सेन ने इस संबंध में प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भेजकर मांग की है कि 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के दायरे में ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से उप-कोटा सुनिश्चित किया जाए।

​राजेन्द्र सेन ने अपने संबोधन में कहा कि देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा ओबीसी समाज की महिलाओं का है, लेकिन वर्तमान में लोकसभा, विधानसभा और राज्यसभा में उनका प्रतिनिधित्व लगभग नगण्य है। उन्होंने जोर देते हुए कहा:

​”यदि महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं को उनका वाजिब हिस्सा नहीं दिया जाता है, तो यह न केवल सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा, बल्कि नारी सशक्तिकरण की मूल भावना के साथ भी अन्याय होगा।”

 

अधिनियम का वास्तविक लाभ तभी संभव

सेन ने सरकार के इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि महिलाओं को राजनीति की मुख्यधारा में लाने का यह प्रयास सराहनीय है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका वास्तविक लाभ तभी मिल पाएगा जब समाज के हर वर्ग की महिला को समान अवसर मिलें। वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, 33 प्रतिशत आरक्षण के भीतर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की महिलाओं के लिए तो आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन इसमें ओबीसी वर्ग को शामिल नहीं किया गया है।

राजनीतिक गलियारों में बढ़ती मांग

राजेन्द्र सेन की इस मांग को व्यापक राजनीतिक समर्थन भी मिलता दिख रहा है। हाल के दिनों में कई प्रमुख राजनीतिक दलों और नेताओं ने भी महिला आरक्षण के भीतर एससी, एसटी और ओबीसी महिलाओं के लिए उप-कोटा (Quota within Quota) की मांग उठाई है। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भी इस अधिनियम का समर्थन करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा है कि ओबीसी महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए अलग प्रावधान होना अनिवार्य है।

​अब देखना यह है कि तीन दिवसीय इस मंथन में सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है और क्या अधिनियम में ओबीसी महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर कोई नया संशोधन या स्पष्टीकरण शामिल किया जाता है।

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