खाद्य संकट, भीषण सूखा और बिजली ठप होने की आशंका; प्रशांत महासागर की हलचल ने बढ़ाई वैश्विक सरकारों और निवेशकों की धड़कनें।
गौरव कोचर| नई दिल्ली
प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के गर्भ में इस समय एक ऐसी खौफनाक मौसमी हलचल आकार ले रही है, जिसने दुनिया भर के नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और अमेरिकी मौसम एजेंसी ‘नोआ’ (NOAA) सहित तमाम वैश्विक संस्थाओं के ताजा अनुमानों के मुताबिक, महासागर का तापमान सामान्य से कई गुना तेजी से बढ़ रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यह कोई सामान्य मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि एक बेहद खतरनाक “सुपर एल नीनो” (Super El Niño) का रूप ले रहा है।
अगर यह आशंका सच साबित होती है, तो यह चक्र न केवल 2027 को धरती का अब तक का सबसे गर्म साल बना देगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भीषण मंदी और रिकॉर्डतोड़ महंगाई की ओर भी धकेल सकता है।
क्या है यह ‘सुपर एल नीनो’ का खौफनाक विज्ञान?
’एल नीनो’ (El Niño) एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसके कारण दुनिया भर में हवाओं और बारिश का पूरा सिस्टम ही पलट जाता है।
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- सामान्य बनाम सुपर संकट: जब समुद्र की सतह का तापमान (SST) सामान्य से 0.5^\circ\text{C} अधिक हो, तो इसे सामान्य एल नीनो कहते हैं। लेकिन जब यह उछाल 2^\circ\text{C} या उससे अधिक हो जाता है, तो इसे ‘सुपर एल नीनो’ की श्रेणी में रखा जाता है।
- इतिहास की डरावनी गवाही: आधुनिक मौसम विज्ञान के इतिहास में अब तक केवल कुछ ही बार (जैसे 1982-83, 1997-98 और 2015-16) सुपर एल नीनो दर्ज किया गया है। वर्तमान क्लाइमेट मॉडल्स संकेत दे रहे हैं कि यह चक्र पिछले 140 वर्षों में सबसे तीव्र हो सकता है।
डबल मार: वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस बार यह सुपर एल नीनो पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग से तप रही धरती पर दस्तक दे रहा है। यानी वायुमंडल में पहले से मौजूद अतिरिक्त गर्मी इस संकट को कई गुना अधिक घातक बना देगी।
2027 ही क्यों बनेगा सबसे गर्म साल? समझें ‘लैग टाइम’ का गणित
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, महासागर में उठने वाली इस गर्मी का असर तुरंत सतह पर दिखाई नहीं देता। समुद्र से निकलने वाली थर्मल एनर्जी को पूरी तरह से वायुमंडल में फैलने में कुछ महीनों का समय (Lag Time) लगता है।
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- 2026 में शुरुआत: यह एल नीनो इस वर्ष के मध्य से सक्रिय हो रहा है और साल के अंत तक इसके अपने चरम पर पहुंचने की संभावना है।
- 2027 में महा-विस्फोट: महासागरीय गर्मी का अधिकतम असर कुछ महीनों बाद दिखेगा, जिसके चलते 2027 वैश्विक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़कर मानव इतिहास का सबसे गर्म और झुलसाने वाला साल साबित हो सकता है।
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ग्लोबल वेदर का बिगड़ेगा संतुलन: कहीं सूखा, कहीं विनाशकारी बाढ़
सुपर एल नीनो का प्रभाव वैश्विक स्तर पर मौसम को दो चरम छोरों (Extremes) पर ले जाता है:
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- एशिया और ऑस्ट्रेलिया में सूखा: भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया (थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया) और ऑस्ट्रेलिया में इसके कारण मानसून कमजोर पड़ता है, जिससे भीषण सूखे और जंगलों की आग (Bushfires) का खतरा बढ़ जाता है।
- अमेरिका में जलप्रलय: इसके विपरीत, दक्षिण अमेरिका (पेरू, इक्वाडोर) और दक्षिणी अमेरिका (US) में इसके कारण अत्यधिक भारी बारिश, विनाशकारी तूफान और बाढ़ आती है।
- अफ्रीका में अकाल: पूर्वी और मध्य अफ्रीका के देशों में लंबे समय तक सूखा पड़ने से भुखमरी और जल संकट गहराने की आशंका है।
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महंगाई का नया चक्रवात: कैसे प्रभावित होगी ग्लोबल इकॉनमी?
हाजिर बाजार (Commodity Market) और वैश्विक निवेशक इस समय इस शब्द को लेकर सबसे ज्यादा चौकन्ने हैं। इसका सीधा संबंध आम जनता की जेब और देशों की जीडीपी से है:
1. ‘फूड इन्फ्लेशन’ (खाद्य महंगाई) का तगड़ा झटका
दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया को दुनिया का “अन्न भंडार” कहा जाता है। सूखे के कारण फसलों के उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा:
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- चावल और चीनी: थाईलैंड-वियतनाम दुनिया के शीर्ष चावल निर्यातक हैं। भारत में भी कृषि मानसून पर निर्भर है। धान, गन्ना और दलहन की फसलें नष्ट होने से वैश्विक बाजारों में खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू सकते हैं।
- पाम ऑयल और कॉफी: इंडोनेशिया-मलेशिया में पाम ऑयल और अन्य देशों में कॉफी का उत्पादन घटने से रोजमर्रा के उपभोग की वस्तुएं महंगी हो जाएंगी।
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2. बिजली ग्रिड फेल होने का खतरा
भीषण गर्मी और हीटवेव (Heatwaves) के चलते दुनिया भर में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगी। वहीं, सूखे के कारण हाइड्रो-पावर प्रोजेक्ट्स (जलविद्युत) ठप हो जाएंगे, जिससे बड़े पैमाने पर बिजली कटौती का सामना करना पड़ सकता है।
3. ठप होगी वैश्विक सप्लाई चेन
पनामा नहर जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जलमार्गों में पानी का स्तर घटने से मालवाहक जहाजों की आवाजाही प्रभावित होगी, जिससे समुद्री माल ढुलाई (Freight Costs) महंगी हो जाएगी।
भारत पर क्या होगा इसका सीधा असर?
भारतीय उपमहाद्वीप के लिए मानसून को देश का “असली वित्त मंत्री” माना जाता है। सुपर एल नीनो की वजह से भारत के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं:
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- कमजोर मानसून की मार: जून से सितंबर के दौरान होने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश कमजोर पड़ सकती है। इससे चावल, दालें और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित होगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगेगा।
- जलाशयों का सूखना: देश के प्रमुख बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से नीचे जा सकता है, जिससे पीने के पानी और सिंचाई दोनों के लिए आपातकालीन स्थिति पैदा हो सकती है।
- आरबीआई (RBI) की बढ़ेगी चिंता: खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से रिटेल महंगाई दर पर सीधा दबाव आएगा, जिससे ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें धूमिल हो सकती हैं।
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‘अलर्ट मोड’ पर दुनिया
”सुपर एल नीनो” केवल एक मौसमी शब्द नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक और मानवीय संकट है। हालांकि मौसम विज्ञानियों का कहना है कि हवाओं के रुख में मामूली बदलाव इसके असर को थोड़ा कम या ज्यादा कर सकता है, लेकिन सरकारों के लिए यह समय हाथ पर हाथ धरे बैठने का नहीं है। समय रहते आपातकालीन नीतियां (Contingency Plans), सिंचाई के वैकल्पिक साधन और अनाज के बफर स्टॉक का मजबूत प्रबंधन ही इस आने वाले आर्थिक झटके की तीव्रता को कम कर सकता है।