सोलापुर/पंढरपुर: अर बी चतुर्वेदी
एक तरफ जहाँ देश-दुनिया में धर्म के नाम पर दूरियाँ बढ़ने और इंसानियत के कम होने की खबरें विचलित करती हैं, वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र के पवित्र तीर्थ स्थल पंढरपुर से सांप्रदायिक सौहार्द और इंसानियत की एक ऐसी बेमिसाल तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे देश को सोचने और गर्व करने पर मजबूर कर दिया है।
पंढरपुर के मुस्लिम समुदाय ने आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करते हुए इस वर्ष ईद-उल-अजहा (बकरीद) के मौके पर बकरों की कुर्बानी को टालने का एक ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसला लिया है। यह कदम हिंदुओं के पवित्र त्योहार ‘अधिक मास एकादशी’ (आषाढ़ी एकादशी) के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उठाया गया है।
एक ही दिन आ रहे हैं दोनों बड़े त्योहार
इस वर्ष का संयोग ऐसा है कि मुस्लिम समाज का प्रमुख त्योहार बकरीद और हिंदू समाज के लिए बेहद पवित्र मानी जाने वाली अधिक मास एकादशी (पंढरपुर में भगवान विट्ठल के दर्शन का महा-उत्सव) एक ही दिन पड़ रहे हैं।
पंढरपुर में इस दौरान देश भर से लाखों ‘वारकरी’ (श्रद्धालु) भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। पूरे शहर में भक्ति का माहौल होता है और चारों तरफ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। स्थिति की संवेदनशीलता और त्योहार की पवित्रता को देखते हुए स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने यह बड़ा फैसला लिया।
”भगवान विट्ठल के भक्तों की भावनाओं का सम्मान सर्वोपरि”
स्थानीय मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे वर्षों से पंढरपुर की इस पावन धरती पर रह रहे हैं और यहाँ की संस्कृति का हिस्सा हैं।
”मैं पंढरपुर में रहता हूँ और बचपन से ही मंदिर के कई त्योहारों और व्यवस्थाओं से जुड़ा रहा हूँ। हमारे देश की यही खूबसूरती है कि हम एक-दूसरे के सुख-दुख और आस्था में शामिल हों। भगवान विट्ठल के भक्तों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, हमने इस बार एकादशी के दिन बकरों की कुर्बानी न देने का फैसला किया है। इसे कुछ दिनों के लिए आगे बढ़ा दिया गया है।”
— मुस्लिम समुदाय के एक स्थानीय सदस्य
फैसले के मुख्य बिंदु और समाज पर प्रभाव
- कुर्बानी को आगे बढ़ाया: मुस्लिम समाज ने तय किया है कि एकादशी के पवित्र दिन जब लाखों शाकाहारी श्रद्धालु शहर में होंगे, तब वे पारंपरिक कुर्बानी की प्रक्रिया नहीं करेंगे। इसे एकादशी के समापन और माहौल सामान्य होने के बाद किया जाएगा।
- सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल: पंढरपुर हमेशा से संतों की भूमि रही है। इस फैसले ने साबित कर दिया है कि संतों के विचार आज भी यहाँ के लोगों के दिलों में जिंदा हैं।
- प्रशासन को मिली बड़ी राहत: एक ही दिन दो बड़े त्योहार होने के कारण पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर कानून-व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने का भारी दबाव था। मुस्लिम समुदाय के इस स्वैच्छिक फैसले से प्रशासन ने भी राहत की सांस ली है और इस पहल का स्वागत किया है।
देश के लिए एक बड़ा संदेश
आज के दौर में जब छोटी-छोटी बातों पर तनाव पैदा करने की कोशिशें की जाती हैं, ऐसे समय में पंढरपुर के मुसलमानों का यह कदम यह सीख देता है कि मजहब आपस में बैर रखना नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सम्मान करना सिखाता है। पंढरपुर से उठी सौहार्द की यह गूँज सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश को अमन, चैन और भाईचारे के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दे रही है।