जयपुर, 17 जून 2026 | नरेश गुनानी
महाराणा प्रताप जयंती के पावन अवसर पर बुधवार को भारतीय क्षत्रिय महासंघ द्वारा एक भव्य सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने क्षत्रिय समाज की प्रतिभावान विभूतियों को सम्मानित किया।
समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने इतिहास के पन्नों को रेखांकित किया और कहा कि अगर छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप एक ही कालखंड में होते, तो भारत का इतिहास आज कुछ और ही होता। दोनों महानायकों ने अपनी अद्भुत वीरता, अदम्य साहस और बेमिसाल शौर्य से मुगल आक्रांताओं को घुटने टेकने पर मजबूर किया और उनके मंसूबों को पूरी तरह नाकाम कर दिया।
हल्दीघाटी से दिवेर तक: मुगल सेना को चटाई धूल
राज्यपाल ने महाराणा प्रताप के सैन्य कौशल और रणनीतिक सूझबूझ की सराहना करते हुए कहा:
”हल्दीघाटी के ऐतिहासिक युद्ध में प्रताप ने विशाल मुगल सेना के हौसले पस्त कर दिए थे। इसके बाद उन्होंने बेहद सुनियोजित तरीके से हमला कर दिवेर के युद्ध में अकबर की सेना को आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया। वह देश के पहले ऐसे स्वाधीनता सेनानी थे, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष किया और अपने शौर्य से पूरे देश को गौरवान्वित किया।”
उन्होंने युद्ध के असमान आंकड़ों का जिक्र करते हुए बताया कि अकबर ने कभी सीधे प्रताप का सामना नहीं किया, बल्कि राजा मानसिंह को युद्ध के लिए भेजा। उस समय अकबर की सेना करीब एक लाख थी, जबकि प्रताप के पास महज बीस हजार सैनिक थे। चार गुना से भी अधिक बड़ी सेना होने के बावजूद प्रताप ने अपने अदम्य साहस के बल पर मुगलों को धूल चटा दी।
भक्ति और शक्ति की अनूठी धरा है मेवाड़
भाषण के दौरान राज्यपाल ने मेवाड़ की गौरवशाली धरती को नमन किया। उन्होंने कहा कि यह धरा भक्ति और शक्ति का बेजोड़ संगम है। इसी मिट्टी ने बप्पा रावल जैसे महान प्रतापी शासक को जन्म दिया, जिन्होंने अरब आक्रांताओं को भारत की सीमाओं से खदेड़ा था। उनके पराक्रम का ही असर था कि अगले सौ साल तक किसी विदेशी ताकत ने भारत की तरफ आंख उठाने की हिम्मत नहीं की।
उन्होंने महाराणा सांगा और त्याग की प्रतिमूर्ति पन्ना धाय का स्मरण करते हुए इस बात पर जोर दिया कि देश की नई पीढ़ी को भारत के इस सच्चे और गौरवशाली इतिहास की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने और बच्चों की बौद्धिक क्षमता को निखारने का आह्वान किया।
नैतिकता और सर्वसमाज को साथ लेकर चलने वाले शासक
महाराणा प्रताप के मानवीय और नैतिक मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए बागडे ने एक ऐतिहासिक प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि जब प्रताप के पुत्र अमरसिंह ने मुगल सेनापति अब्दुल रहीम खान-ए-खाना के परिवार की महिलाओं को बंदी बना लिया था, तब प्रताप ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने स्त्री अस्मिता का सम्मान करते हुए उन बेगमों को पूरे आदर-सत्कार के साथ सुरक्षित वापस भिजवाया।
सर्वसमावेशी सेना के प्रतीक थे प्रताप:
प्रताप की सेना केवल किसी एक वर्ग की नहीं थी, बल्कि उसमें भील जनजाति, जाट और अन्य सभी जातियों के योद्धा कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे थे। भील सरदार राणा पूंजा उनकी सेना के सबसे प्रमुख स्तंभों में से एक थे।
भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणापुंज
राज्यपाल ने अंत में कहा कि महाराणा प्रताप की जन्म-जयंती महज एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमें उनके महान आदर्शों पर चलते हुए जीवन में हर प्रकार के अन्याय, अधर्म और अनैतिकता के खिलाफ मजबूती से खड़े होने और लड़ने की शाश्वत प्रेरणा देती है।