महात्मा गांधी के ‘राम’ के नाम पर बिल आना ऐतिहासिक, विकसित भारत की ओर बड़ा कदम: देवकीनंदन ठाकुर
(हरिप्रसाद शर्मा) जयपुर। गुलाबी नगरी में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान विख्यात कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने धर्म, राष्ट्र और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर मुखरता से अपने विचार साझा किए। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा ‘राम’ के नाम पर लाए गए बिल का पुरजोर समर्थन करते हुए इसे गांधीवादी मूल्यों का सम्मान बताया।
गांधीजी के ‘राम’ और विकसित भारत का संकल्प
कथा के दौरान देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि जिस राम का नाम महात्मा गांधी अंतिम श्वास तक लेते थे और जिनकी ‘रामधुन’ पूरे देश में गूंजती थी, आज उन्हीं के नाम पर सरकार द्वारा बिल का नाम रखा जाना गांधीजी के मन की आवाज को साकार करने जैसा है।
- समर्पण: उन्होंने कहा कि यह बिल महात्मा गांधी की भावनाओं को समर्पित है।
- समावेशी सोच: उनके अनुसार, रामजी किसी एक वर्ग के नहीं बल्कि संपूर्ण समाज के आराध्य हैं। ‘राम’ का नाम जोड़ना केवल आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और नैतिक मूल्यों का प्रतीक है।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा: दोहरे मापदंड पर प्रहार
पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों का उल्लेख करते हुए कथावाचक ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने वैश्विक समुदाय और मानवाधिकारों की बात करने वालों के ‘दोहरे मापदंड’ पर सवाल उठाए:
”वहां हिंदुओं को जिंदा जलाया जा रहा है, उन पर हिंसा हो रही है क्योंकि वे अल्पसंख्यक हैं। लेकिन भारत में, जहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं, वहाँ कुछ लोग कहते हैं कि उन पर अत्याचार हो रहा है। यह दोहरा मापदंड अब बंद होना चाहिए।”
हिंदू एकता और स्वाभिमान का आह्वान
देवकीनंदन ठाकुर ने हिंदू समाज से संगठित होने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म कभी हिंसा या अत्याचार का पक्षधर नहीं रहा है, लेकिन अब समय अपनी रक्षा के लिए जागने का है।
- संगठन में शक्ति: उन्होंने कहा कि एकता से ही संस्कृति और धर्म का विस्तार संभव है।
- सम्मान का अधिकार: हिंदुओं को दुनिया में सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है और जो जिस भाषा में समझता है, उसे उसी भाषा में जवाब देना आवश्यक है ताकि न्याय स्थापित हो सके।
सामाजिक समरसता ही विकास का आधार
कथावाचक ने अंत में जोर देकर कहा कि राम के आदर्शों पर चलकर ही विकसित भारत का सपना पूरा होगा। जब तक समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव खत्म नहीं होगा और सभी हिंदू भाई एक सूत्र में नहीं बंधेंगे, तब तक चुनौतियां बनी रहेंगी। उन्होंने भक्तों से आह्वान किया कि वे अपने अधिकारों और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए संकल्पित हों।