लोकेंद्र सिंह शेखावत
भागलपुर । अध्यात्म और तंत्र साधना की दस महाविद्याओं में विशिष्ट स्थान रखने वाली माँ छिन्नमस्ता की जयंती इस वर्ष 30 अप्रैल 2026 (गुरुवार) को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाएगी। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी के पावन अवसर पर होने वाला यह महोत्सव देवी के प्राकट्य दिवस का प्रतीक है।
सृष्टि और संहार का संतुलन हैं छिन्नमस्ता
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भविष्यवेत्ता एवं ज्योतिष योग शोध केन्द्र के संस्थापक, पंo आरo केo चौधरी (बाबा-भागलपुर) के अनुसार, यह जगत परिवर्तनशील है और माँ छिन्नमस्ता इसी परिवर्तन की अधिष्ठात्री हैं। उन्होंने बताया कि जहाँ माँ भुवनेश्वरी सृष्टि के विकास और आगम का प्रतीक हैं, वहीं छिन्नमस्ता उस अवस्था की शक्ति हैं जब निर्गम (क्षय) अधिक और आगम कम होता है। यह देवी ब्रह्मांड के निरंतर ह्रास और वृद्धि के चक्र को संतुलित करती हैं।

पौराणिक कथा: सहेलियों की क्षुधा शांत करने हेतु आत्म-त्याग
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवती भवानी मंदाकिनी नदी में स्नान के पश्चात अपनी सहेलियों जया और विजया के साथ थीं। भूख से व्याकुल सहेलियों के विनम्र आग्रह पर देवी ने ममता और त्याग की पराकाष्ठा दिखाते हुए अपना ही शीश काट लिया। कटा हुआ सिर देवी के हाथ में आ गिरा और उनके गले से रक्त की तीन धाराएँ फूटीं। दो धाराओं से उन्होंने अपनी सहेलियों की भूख शांत की और तीसरी धारा का स्वयं पान किया। इसी अलौकिक घटना के कारण उन्हें ‘छिन्नमस्तिके’ कहा गया।
योग और साधना का गहरा रहस्य
माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप जितना गोपनीय है, उतना ही आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण भी है:
- ग्रंथि भेदन और सिद्धि: योग शास्त्र के अनुसार, साधक जब ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र ग्रंथियों का भेदन करता है, तभी उसे अद्वैतानंद की प्राप्ति होती है। माँ छिन्नमस्ता का पूजन मणिपुर चक्र में ध्यान लगाकर किया जाता है, जिससे काम और रति पर विजय प्राप्त कर साधक ऊर्ध्वगामी बनता है।
- सर्वधर्म समन्वय: ‘वज्र वैरोचनी’ के नाम से विख्यात यह शक्ति शाक्त, बौद्ध और जैन मतों में समान रूप से पूजनीय हैं।
- अमोघ फल: तंत्र शास्त्र के अनुसार, आधी रात (चतुर्थ संध्याकाल) में इनकी उपासना से शत्रु विजय, राज्य प्राप्ति, वाक-सिद्धि (सरस्वती) और दुर्लभ मोक्ष की प्राप्ति होती है।
स्वरूप और प्रतीक
श्वेत कमल के पीठ पर खड़ी, दिशाओं को वस्त्र मानकर धारण करने वाली माँ छिन्नमस्ता के नाभि में योनि चक्र है। उनके साथ रज और तम गुणों की प्रतीक उनकी सहचरियां विद्यमान रहती हैं। यह स्वरूप संकेत देता है कि अहंकार (शीश) के बलिदान के बिना पूर्ण अंतर्मुखी साधना संभव नहीं है।
भगवान परशुराम और गुरु गोरखनाथ जैसे महान साधकों द्वारा पूजित माँ छिन्नमस्ता की आराधना साधक को जीव भाव से मुक्त कर शिव भाव में विलीन कर देती है। जयंती के अवसर पर विभिन्न सिद्ध पीठों और मंदिरों में विशेष अनुष्ठान एवं साधना शिविरों का आयोजन किया जाएगा।