पशुपालन मंत्री जोराराम कुमावत ने किया पाली के खैरोफड़ा ग्राम का दौरा, मॉडल को बताया प्रेरणादायी।
बूंद-बूंद सिंचाई और प्राकृतिक खाद के अनूठे संगम से कम लागत में मिल रहा बंपर मुनाफा।
सीमित पानी में प्राकृतिक खेती का अनूठा प्रयोग, मरुधरा के लिए बना मिसाल
नरेश गुनानी
जयपुर। राजस्थान के रेगिस्तानी और कम पानी वाले इलाकों में पारंपरिक खेती के बजाय बागवानी और प्राकृतिक कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान अब अपनी तकदीर खुद बदल रहे हैं। ऐसा ही एक प्रेरक मामला पाली जिले के सुमेरपुर विधानसभा क्षेत्र से सामने आया है, जहां एक प्रगतिशील किसान ने सूखी धरती पर खजूर का ऐसा बाग तैयार किया है जो आज पूरे प्रदेश के लिए एक रोल मॉडल बन गया है।
पशुपालन मंत्री जोराराम कुमावत ने सुमेरपुर के खोड़ मण्डल स्थित खैरोफड़ा ग्राम का दौरा कर इस प्राकृतिक खेती आधारित खजूर के बाग का गहन निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने वहां अपनाई जा रही आधुनिक कृषि पद्धति, उन्नत जल प्रबंधन और उत्पादन व्यवस्था की जमकर सराहना की और इसे क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बताया।
5 वर्ष की कड़ी मेहनत लाई रंग, 270 पौधों से हो रही मोटी कमाई
निरीक्षण के दौरान प्रगतिशील कृषक ने पशुपालन मंत्री को अपनी सफलता की कहानी साझा की। किसान ने बताया कि लगभग 5 वर्ष पूर्व उन्होंने अपने खेत में खजूर के 270 पौधे लगाए थे।
शुरुआती वर्षों में बेहतर देखरेख, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सही प्रबंधन के चलते आज ये सभी पौधे पूरी तरह विकसित हो चुके हैं और इनमें भरपूर फल आ रहे हैं। इस सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खजूर के इस बाग से अब किसान को प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख रुपये की शानदार वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। किसान के इस कड़े परिश्रम और सफलता को देख कैबिनेट मंत्री ने उनकी पीठ थपथपाई।
जल संरक्षण और जीरो बजट फार्मिंग: लागत कम, मुनाफा ज्यादा
इस पूरे कृषि मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूरी तरह से पर्यावरण अनुकूल (Eco-friendly) होना है, जो वर्तमान समय में खेती के लिए सबसे जरूरी है।
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- बूंद-बूंद (ड्रिप) सिंचाई: पानी की कमी से जूझने वाले इस क्षेत्र में कृषक द्वारा बाग में ड्रिप सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है। इससे पानी की एक-एक बूंद का समुचित और किफायती उपयोग सुनिश्चित होता है और पौधों को जरूरत के अनुसार ही पानी मिलता है।
- शत-प्रतिशत प्राकृतिक खाद: पौधों को पोषण देने के लिए बाजार में मिलने वाले महंगे और हानिकारक रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) को पूरी तरह नकार दिया गया है। इसकी जगह खेत में तैयार प्राकृतिक खाद का प्रयोग किया जा रहा है।
दोहरा लाभ: इस दोहरे प्रबंधन से जहां एक ओर भूमि की उर्वरा शक्ति (Soil Fertility) लंबे समय के लिए बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर खेती की लागत नाममात्र रह गई है, जिससे यह सौदा बेहद लाभकारी साबित हो रहा है।
क्षेत्र के किसानों के लिए रोल मॉडल बनेगा यह प्रयोग
खेत का मुआयना करने के बाद मंत्री जोराराम कुमावत ने कहा:
”सीमित पानी में और पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से खजूर की खेती करना कृषि क्षेत्र में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव है। प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण और सटीक कृषि प्रबंधन का यह अनूठा प्रयास मरूभूमि के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह मॉडल न केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखता है, बल्कि किसानों की आय को कई गुना बढ़ाने के सरकार के संकल्प को भी पूरा करता है।”
उन्होंने मौके पर मौजूद कृषि विभाग के अधिकारियों और स्थानीय किसानों से इस सफल प्रयोग को देखने, समझने और सीखने का आह्वान किया ताकि क्षेत्र में आधुनिक बागवानी को और अधिक बढ़ावा दिया जा सके और किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सके।