गौरव कोचर
भारत और पाकिस्तान के बीच जल कूटनीति (Water Diplomacy) एक बार फिर चरम पर पहुंच गई है। भारत द्वारा चिनाब नदी पर निर्माणाधीन रणनीतिक जलविद्युत परियोजनाओं के रुख और पानी के नियंत्रण को लेकर पाकिस्तान में भारी हड़कंप मचा हुआ है। इस्लामाबाद ने इस कदम पर गहरी चिंता जताते हुए भारत को चेतावनी दी है कि वह अपनी जल संप्रभुता की रक्षा के लिए ‘सभी उपलब्ध विकल्पों’ का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।
विवाद की मुख्य वजह: भारत की रणनीतिक जल परियोजनाएं
सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty – IWT) के तहत चिनाब, झेलम और सिंधु नदी के पानी पर पाकिस्तान का अधिकार (कुछ शर्तों के साथ) तय किया गया था। हालांकि, भारत को इन नदियों पर ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ (Run-of-the-river) परियोजनाएं बनाने और बिजली पैदा करने का पूरा कानूनी हक है।
हालिया तनाव भारत द्वारा चिनाब नदी पर बनाए जा रहे कुछ प्रमुख बांधों और जलाशयों के कारण बढ़ा है:
- किरू और रतले जलविद्युत परियोजनाएं: जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बन रही इन परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइन और पानी मोड़ने (Diversion) की क्षमता को लेकर पाकिस्तान लंबे समय से आपत्ति जता रहा है।
- भारत का कड़ा रुख: भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने हिस्से के पानी की एक-एक बूंद का इस्तेमाल करेगा और तकनीकी सुधारों के जरिए परियोजनाओं के काम में तेजी लाएगा।
पाकिस्तान की बौखलाहट: ‘सभी विकल्प’ खुले होने की धमकी
चिनाब नदी का रुख भारत की तरफ आंशिक रूप से मुड़ने या पानी के प्रवाह पर भारत का नियंत्रण बढ़ने की खबरों से पाकिस्तान के कृषि और ऊर्जा क्षेत्र में डर का माहौल है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय और जल संसाधन विभाग की ओर से जारी बयानों में कहा गया है:
”भारत द्वारा सिंधु जल समझौते का कोई भी उल्लंघन या नदी के प्राकृतिक प्रवाह को कृत्रिम रूप से मोड़ना पाकिस्तान की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला माना जाएगा। पाकिस्तान अपनी जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) जाने से लेकर ‘अन्य सभी कूटनीतिक व सैन्य विकल्पों’ पर विचार कर सकता है।”
पाकिस्तान के डर के पीछे के मुख्य कारण:
- कृषि पर संकट: पाकिस्तान का पंजाब प्रांत पूरी तरह से चिनाब और झेलम के पानी पर निर्भर है। पानी रुकने या कम होने से उसकी फसलें बर्बाद हो सकती हैं।
- रणनीतिक नुकसान: युद्ध या तनाव की स्थिति में भारत द्वारा पानी रोके जाने या अचानक छोड़े जाने का डर पाकिस्तान को हमेशा सताता रहता है।
सिंधु जल समझौता (IWT) और भारत का रुख
1960 में हुए सिंधु जल समझौते के तहत छह नदियों के पानी का बंटवारा हुआ था:
- पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलुज): इस पर भारत का पूरा अधिकार है।
- पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब): इसका पानी पाकिस्तान के लिए आवंटित है, लेकिन भारत इस पर बिजली परियोजनाएं बना सकता है।
भारत का स्पष्ट रुख है कि वह समझौते के दायरे में रहकर ही काम कर रहा है। नई दिल्ली ने पहले ही पाकिस्तान को सिंधु जल समझौते में संशोधन के लिए नोटिस भेज रखा है, क्योंकि पाकिस्तान लगातार भारत की हर विकास परियोजना में अड़ंगा लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का दुरुपयोग करता आया है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब पाकिस्तान की ‘पानी की धमकियों’ के आगे झुकने वाला नहीं है। भारत जम्मू-कश्मीर के विकास और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए चिनाब व अन्य नदियों पर तेजी से काम पूरा कर रहा है। पाकिस्तान की यह ताजा धमकी उसकी आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक विफलता से ध्यान भटकाने और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने की एक और कोशिश मानी जा रही है।
दोनों देशों के बीच जल विवाद आने वाले दिनों में और अधिक आक्रामक कूटनीतिक मोड़ ले सकता है।